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फीस का हिसाब लेने के फरमान ने बढ़ाई करदाताओं की टेंशन
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 25 Mar 2016 12:19 AM IST
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आयकर विभाग की ओर से शिक्षण संस्थानों से फीस का हिसाब लेने का फैसला होने के बाद आम करदाताओं को चिंता बढ़नी तय है। उनके लिए पहले तो सीमित वेतन और उसमें भी आयकर अदा करना, फिर बच्चों की अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए किसी तरह रकम की व्यवस्था कर फीस भरने पर अब आयकर विभाग को उसका भी हिसाब देना है। विभाग के इस फैसले से उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण संस्थानों में मैनेजमेंट कोटे के तहत बच्चों का प्रवेश कराने वाले अभिभावकों की भी मुश्किल बढ़ने वाली हैं। इसमें बड़ी संख्या डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, सीए, आर्किटेक्ट, बड़े अधिवक्ता जैसे लोग शामिल हैं, जो बच्चों को अपने प्रोफेशन से जोड़ने के लिए मैनेजमेंट कोटे में प्रवेश दिलाकर मोटी फीस अदा करते हैं। अब फीस के रूप में अदा की भारी-भरकम रकम का हिसाब आयकर विभाग लेगा।
आयकर विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो शहर में ऐसे करदाताओं की संख्या 35 हजार से ऊपर है, जिनका सालाना वेतन चार-पांच लाख रुपये या उससे अधिक है। यानी महीने में 35-45 हजार रुपये तक वेतन मिलता है। ऐसे लोग सालाना आयकर भी अदा करते हैं। ऐसे करदाताओं में कई के बच्चे देहरादून, नैनीताल, मसूरी के बड़े और महंगे कॉन्वेंट स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जिनकी सालाना फीस दो लाख रुपये या उससे अधिक है। उदाहरण के लिए इस वेतन श्रेणी में आने वाले किसी व्यक्ति के दो बच्चे हैं और वह एक को भी ऐसे स्कूल में पढ़े रहे हैं तो सालाना दो लाख रुपये या उससे अधिक फीस के रूप में ही अदा कर दे रहे हैं। परिवार का बाकी खर्च भी उसी वेतन में शामिल है तो अब आयकर विभाग को यह बताना होगा कि पांच-छह लाख रुपये सालाना वेतन और उसमें दो लाख रुपये से अधिक फीस भरने के लिए रकम की व्यवस्था कैसे की।
उधर, व्यापारियों को छोड़ भी दें तो शहर में ऐसे कई बड़े डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और अधिवक्ता हैं जो बच्चों को अपने प्रोफेशन ही रखना चाहते हैं। ऐसे तमाम प्रोफेशनर्ल्स के बच्चे मुंबई, चेन्नई, बंगलूरू, दिल्ली आदि में बड़े शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन बच्चों का ऐसे संस्थानों में अगर प्रवेश परीक्षा के तहत एडमीशन नहीं होता है तो अभिभावक मैनेजमेंट कोटा में पांच लाख रुपये या उससे अधिक रकम देकर प्रवेश कराते हैं। मैनेजमेंट कोटे से प्रवेश दिलाने के बाद एजूकेशन फीस, फूडिंग-लॉजिंग समेत अन्य मदों में सालाना मोटी फीस भी अदा करते हैं। मैनेजमेंट कोटा के तहत प्रवेश के संबंध में शिक्षण संस्थानों को पूरी जानकारी आयकर विभाग को देनी होगी, फिर चाहे फीस के रूप में कितनी भी रकम अदा की गई हो।
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ब्रांड के फेर में भर रहे मोटी फीस
पांच-छह लाख रुपये सालाना वेतन पाने वालों में काफी ऐसे लोग भी हैं जो ब्रांड के फेर में कॉन्वेंट स्कूलों में फीस के रूप में मोटी रकम अदा कर रहे हैं। देहरादून, नैनीताल, मसूरी आदि में कई ऐसे कॉन्वेंट स्कूल हैं जहां हर तीन माह में 70-75 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये या उससे अधिक फीस ली जाती है।
शिक्षण संस्थानों की लागत की तैयार होगी रिपोर्ट
भारतीय लागत एवं प्रबंधन संस्थान भी शिक्षण संस्थानों का हिसाब-किताब लगाने की तैयारी कर रहा है। संस्थान ने मिनिस्ट्रीयल ऑफ कारपोरेट अफेयर के अनुरोध पर शिक्षण संस्थानों में बच्चों की फीस के रूप में होने वाली आय और खर्च की लागत का ब्यौरा एकत्र करने जा रहा है। संस्थान के वरिष्ठ सदस्य डॉ.पवन जायसवाल का कहना है कि लागत प्रमाणित होने के बाद शिक्षण संस्थान 5-10 फीसदी तक भी मुनाफा लें तो फीस काफी कम हो सकती है।
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आयकर विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो शहर में ऐसे करदाताओं की संख्या 35 हजार से ऊपर है, जिनका सालाना वेतन चार-पांच लाख रुपये या उससे अधिक है। यानी महीने में 35-45 हजार रुपये तक वेतन मिलता है। ऐसे लोग सालाना आयकर भी अदा करते हैं। ऐसे करदाताओं में कई के बच्चे देहरादून, नैनीताल, मसूरी के बड़े और महंगे कॉन्वेंट स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जिनकी सालाना फीस दो लाख रुपये या उससे अधिक है। उदाहरण के लिए इस वेतन श्रेणी में आने वाले किसी व्यक्ति के दो बच्चे हैं और वह एक को भी ऐसे स्कूल में पढ़े रहे हैं तो सालाना दो लाख रुपये या उससे अधिक फीस के रूप में ही अदा कर दे रहे हैं। परिवार का बाकी खर्च भी उसी वेतन में शामिल है तो अब आयकर विभाग को यह बताना होगा कि पांच-छह लाख रुपये सालाना वेतन और उसमें दो लाख रुपये से अधिक फीस भरने के लिए रकम की व्यवस्था कैसे की।
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उधर, व्यापारियों को छोड़ भी दें तो शहर में ऐसे कई बड़े डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और अधिवक्ता हैं जो बच्चों को अपने प्रोफेशन ही रखना चाहते हैं। ऐसे तमाम प्रोफेशनर्ल्स के बच्चे मुंबई, चेन्नई, बंगलूरू, दिल्ली आदि में बड़े शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन बच्चों का ऐसे संस्थानों में अगर प्रवेश परीक्षा के तहत एडमीशन नहीं होता है तो अभिभावक मैनेजमेंट कोटा में पांच लाख रुपये या उससे अधिक रकम देकर प्रवेश कराते हैं। मैनेजमेंट कोटे से प्रवेश दिलाने के बाद एजूकेशन फीस, फूडिंग-लॉजिंग समेत अन्य मदों में सालाना मोटी फीस भी अदा करते हैं। मैनेजमेंट कोटा के तहत प्रवेश के संबंध में शिक्षण संस्थानों को पूरी जानकारी आयकर विभाग को देनी होगी, फिर चाहे फीस के रूप में कितनी भी रकम अदा की गई हो।
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ब्रांड के फेर में भर रहे मोटी फीस
पांच-छह लाख रुपये सालाना वेतन पाने वालों में काफी ऐसे लोग भी हैं जो ब्रांड के फेर में कॉन्वेंट स्कूलों में फीस के रूप में मोटी रकम अदा कर रहे हैं। देहरादून, नैनीताल, मसूरी आदि में कई ऐसे कॉन्वेंट स्कूल हैं जहां हर तीन माह में 70-75 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये या उससे अधिक फीस ली जाती है।
शिक्षण संस्थानों की लागत की तैयार होगी रिपोर्ट
भारतीय लागत एवं प्रबंधन संस्थान भी शिक्षण संस्थानों का हिसाब-किताब लगाने की तैयारी कर रहा है। संस्थान ने मिनिस्ट्रीयल ऑफ कारपोरेट अफेयर के अनुरोध पर शिक्षण संस्थानों में बच्चों की फीस के रूप में होने वाली आय और खर्च की लागत का ब्यौरा एकत्र करने जा रहा है। संस्थान के वरिष्ठ सदस्य डॉ.पवन जायसवाल का कहना है कि लागत प्रमाणित होने के बाद शिक्षण संस्थान 5-10 फीसदी तक भी मुनाफा लें तो फीस काफी कम हो सकती है।