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स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती : भारत को बचाने के लिए जरूरी है सनातन धर्म का संरक्षण व संवर्धन
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भारत को बचाने के लिए जरूरी है सनातन धर्म का संरक्षण व संवर्धन
प्रयागराज । काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि यदि भारत को बचाना है, तो सनातन धर्म का संरक्षण और संवर्धन जरूरी है। एक राष्ट्र के रूप में भारत का अस्तित्व ही सनातन धर्म के आधार पर टिका है। जब धर्म के आधार पर ही देश के विभाजन हुआ था तो उसी समय भारत को सनातन वैदिक हिंदू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था।
माघ मेला के गंगोली शिवाला मार्ग स्थित चौसट्टी मठ के शिविर में आयोजित संत सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा, सरकार चाहे जब भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करे, संतों की ओर से भारत को सनातन वैदिक हिंदू राष्ट्र का परमादेश पहले ही दिया जा चुका है। अब संतों का कर्तव्य है कि सनातन वैदिक हिन्दू राष्ट्र बोलने और लिखने के लिए जन-जन को प्रेरित करें।
आरंभ में सम्मेलन में जुटे यतियों का पूजन किया गया। सम्मेलन में अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी ब्रह्माश्रम जी महाराज, अखिल भारतीय दंडी संन्यासी प्रबंधन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी विमलदेव आश्रम जी महाराज, चौसट्टी मठ के महंत स्वामी प्रकाश आश्रम, स्वामी अखंडानंद तीर्थ, स्वामी इंद्र देव आश्रम, पुष्कर मठ काशी के महंत स्वामी श्रवणदेव आश्रम सहित अनेक महंत मौजूद थे।
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निराली है तीर्थराज प्रयाग की महिमा
प्रयागराज। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक माह, इंद्रियों को वश में करके स्नान-ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है। प्रयाग तीर्थों के राजा जबकि मोक्ष देने वाली सातों पुरियां उनकी रानियां हैं। इनमें पटरानी का गौरव काशी को प्राप्त है।
श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने त्रिवेणी मार्ग स्थित शिविर के पंडाल में प्रवचन के दौरान कहा, काशी तीर्थराज को सबसे ज्यादा प्रिय है। प्रयाग ने उन्हें मुक्ति देने का अबाध और अनंत अधिकार भी सौंप रखा है। भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं प्रयागराज के अधिष्ठाता हैं। यहां वह अपने वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं। उनके बारह स्वरूपों को द्वादश माधव के नाम से जाना जाता है।
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प्रयागराज । काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि यदि भारत को बचाना है, तो सनातन धर्म का संरक्षण और संवर्धन जरूरी है। एक राष्ट्र के रूप में भारत का अस्तित्व ही सनातन धर्म के आधार पर टिका है। जब धर्म के आधार पर ही देश के विभाजन हुआ था तो उसी समय भारत को सनातन वैदिक हिंदू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था।
माघ मेला के गंगोली शिवाला मार्ग स्थित चौसट्टी मठ के शिविर में आयोजित संत सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा, सरकार चाहे जब भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करे, संतों की ओर से भारत को सनातन वैदिक हिंदू राष्ट्र का परमादेश पहले ही दिया जा चुका है। अब संतों का कर्तव्य है कि सनातन वैदिक हिन्दू राष्ट्र बोलने और लिखने के लिए जन-जन को प्रेरित करें।
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आरंभ में सम्मेलन में जुटे यतियों का पूजन किया गया। सम्मेलन में अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी ब्रह्माश्रम जी महाराज, अखिल भारतीय दंडी संन्यासी प्रबंधन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी विमलदेव आश्रम जी महाराज, चौसट्टी मठ के महंत स्वामी प्रकाश आश्रम, स्वामी अखंडानंद तीर्थ, स्वामी इंद्र देव आश्रम, पुष्कर मठ काशी के महंत स्वामी श्रवणदेव आश्रम सहित अनेक महंत मौजूद थे।
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निराली है तीर्थराज प्रयाग की महिमा
प्रयागराज। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक माह, इंद्रियों को वश में करके स्नान-ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है। प्रयाग तीर्थों के राजा जबकि मोक्ष देने वाली सातों पुरियां उनकी रानियां हैं। इनमें पटरानी का गौरव काशी को प्राप्त है।
श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने त्रिवेणी मार्ग स्थित शिविर के पंडाल में प्रवचन के दौरान कहा, काशी तीर्थराज को सबसे ज्यादा प्रिय है। प्रयाग ने उन्हें मुक्ति देने का अबाध और अनंत अधिकार भी सौंप रखा है। भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं प्रयागराज के अधिष्ठाता हैं। यहां वह अपने वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं। उनके बारह स्वरूपों को द्वादश माधव के नाम से जाना जाता है।