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हाईकोर्ट : जनजाति की परंपराएं और रीति रिवाज छोड़ने पर खत्म हो जाएगा एसटी का दर्जा
Wed, 23 Sep 2026 05:50 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 23 Sep 2026 05:50 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति अपनी जनजाति की रीति-रिवाजों, परंपराओं को छोड़ देता है और दूसरी धार्मिक पहचान अपना लेता है तो वह एसटी का लाभ नहीं ले सकता। न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकल पीठ ने सोनभद्र जिले की नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा की ओर से दायर तीन याचिकाओं को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
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सोनभद्र निवासी याची ने जन्म से अनुसूचित जनजाति का होने का दावा करते हुए दुद्धी तहसील से एसटी प्रमाण पत्र प्राप्त किया था। इसके बाद उसने 2011 से 2018 के दौरान अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों से कृषि भूमि खरीदी थी। जांच में सामने आया कि याची ने कई दशक पहले सिराजुद्दीन नामक व्यक्ति से विवाह किया था और इस्लाम धर्म अपना लिया है।
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ऐसे में उन्हें एसटी समाज से जुड़े व्यक्ति का जमीन खरीदने का अधिकार नहीं था। इन आधारों पर उप जिलाधिकारी ने 22 जनवरी 2026 के आदेश से उनके बैनामे को रद्द कर दिया। याची इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अंतर-धार्मिक विवाह या धर्म परिवर्तन मात्र से जनजाति की पहचान खत्म नहीं होती लेकिन अदालत के समक्ष यह सिद्ध करना आवश्यक है कि वह व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी जनजाति की परंपराओं, रीति-रिवाजों से जुड़ा हुआ है।
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अदालत ने पाया कि याची ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सकी जो यह साबित कर सके कि विवाह और धर्म बदलने के बावजूद वह जनजाति की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन कर रही थी। इन आधारों के साथ उच्च न्यायालय ने डिप्टी कलेक्टर के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं।