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High Court :  सामाजिक व आर्थिक स्थिति एफआईआर दर्ज कराने में बन सकती है देरी का कारण, दुष्कर्म की सजा बरकरार

Mon, 30 Jun 2025 10:10 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 30 Jun 2025 10:10 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कभी-कभी सामाजिक और आर्थिक स्थिति गरीब व वंचित नागरिकों के भाग्य को नियंत्रित करती है। एफआईआर में देरी को व्यावहारिक रूप से देखा जाना चाहिए।

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Social and economic conditions can be the reason for delay in filing FIR, rape sentence upheld
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कभी-कभी सामाजिक और आर्थिक स्थिति गरीब व वंचित नागरिकों के भाग्य को नियंत्रित करती है। एफआईआर में देरी को व्यावहारिक रूप से देखा जाना चाहिए और देरी के कारण एफआईआर पर संदेह करने या उस पर अविश्वास करने के लिए कोई कठोर नियम लागू नहीं किया जाना चाहिए।

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कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए दुष्कर्म के मामले में एफआईआर दर्ज कराने में 13 दिन की देरी को दरकिनार करते हुए आरोपी की दोषसिद्ध को बरकरार रखा, हालांकि 10 साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर सात साल के साधारण कारावास में बदल दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह व न्यायमूर्ति संदीप जैन की खंडपीठ ने भगवानदीन की अपील पर दिया।

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कानपुर देहात निवासी अपीलकर्ता पर शिकायतकर्ता ने घाटमपुर थाने में नौ नवंबर 1996 को दुष्कर्म, एससी/एसटी एक्ट व अन्य आरोप में मुकदमा दर्ज कराया था। मामले में विशेष न्यायाधीश ने चार मार्च 2011 को दोषी करार देते हुए 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। अपीलकर्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि एफआईआर दर्ज कराने में 13 दिन की देरी हुई है। इस देरी का कोई उचित या न्यायसंगत स्पष्टीकरण नहीं है, इसलिए अभियोजन पक्ष की कहानी झूठी और असंभव है। इस दौरान अन्य दलीलें देते हुए बरी करने की प्रार्थना की।

अभियोजन पक्ष के वकील ने दलील दी कि पति और पीड़िता ने घटना के तुरंत बाद 27 अक्तूबर 1996 को सुबह करीब आठ बजे थाने गए थे, लेकिन पुलिस ने शिकायत दर्ज नहीं की। पीड़ित लगातार एफआईआर दर्ज कराने के प्रयास में लगे रहे। आठ नवंबर 1996 को सीओ घाटमपुर, कानपुर देहात को एक लिखित रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। तब नौ नवंबर 1996 को मुकदमा दर्ज हुआ।

हाईकोर्ट ने मुकदमा देरी से दर्ज कराने के इस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया। पीड़िता की गवाही को पूरी तरह से सत्य और विश्वसनीय मानते हुए दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखा, हालांकि अपीलकर्ता की 70 वर्ष की आयु को ध्यान में रखते हुए 10 साल के कठोर कारावास को सात साल के साधारण कारावास में बदल दिया गया।

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