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कोई रोज कमा रहा करोड़ों तो किसी को फूटी कौड़ी नहीं
सुरभि गुप्ता/अमर उजाला इलाहाबाद
Updated Fri, 01 May 2015 02:29 AM IST
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इलाहाबाद। देश के एक उद्योगपति की रोज की कमाई 29 करोड़ है। लाखों की तादाद में ऐसे लोग हैं जो दस श्रमिकों की माह भर की मजदूरी के बराबर हर महीने बच्चे की फीस भर देते हैं। वहीं, इन सबके बीच सबसे बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अक्सर दो वक्त की रोटी का इंतजाम भी नहीं कर पाते। तमाम मई दिवस आए और बीत गए लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में असमानता का दौर जारी है।
हालात फिर पहले जैसे होते जा रहे हैं। 1886 में जो आंदोलन हुआ, वैसी ही पस्थितियां आज कहीं न कहीं फिर से बन रही है। पूंजीवाद बढ़ने के साथ ही असमानता की खाई और गहरी होती जा रही है। श्रम कानून तो बन गया लेकिन उसका लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच पा रहा। सेंट्रल ऑफ इंडिया ट्रेड यूनियन (सीटू) के जिलामंत्री हरिशचंद्र पांडेय का कहना है कि वर्तमान समय में मई दिवस की प्रासंगिकता काफी बढ़ गई है।
असंगठित क्षेत्रों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की बात तो दूर, लोगों को उनके काम के बदले सम्मानजनक वेतन भी नहीं मिल रहा। मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी के प्रदेश सचिव डॉ. आशीष मित्तल का कहना है कि आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है। मई दिवस की क्रांति काम के निर्धारित आठ घंटे के साथ जीने लायक वेतन के लिए की गई थी। मगर आज भी स्थिति वही है।
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94 प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। नियमित नियुक्तियां खत्म होती जा रही हैं और आउट सोर्सिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। यही वजह है कि सरकार ने प्रतिदिन का जो न्यूनतम मानदेय निर्धारित कर रखा है, वह भी लोगों को नहीं मिल रहा। छह से दस हजार रुपये में पांच लोगों के परिवार को पूरा माह बिताना पड़ रहा है। इतने पैसे में तो माह भर का राशन और सब्जियां भी नहीं आएंगी। ऐसे में बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने और अन्य जरूरतों को पूरा कर पाने के बारे में सोचना भी बेमानी है।
‘पिछले पांच वर्षों में महंगाई में तीन गुना तक इजाफा हुआ है लेकिन उस हिसाब से लोगों की आय में बढ़ोतरी नहीं हुई। जिसका सीधा असर लोगों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। अपनी मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति के लिए भी लोग परेशान हैं। आर्थिक नीतियां और श्रम कानून भी आम लोगों के हित में नहीं है। इसमें सुधार न हुआ तो आने वाले समय में स्थितियां और भी भयावह हो जाएंगी।’ अर्थशास्त्री प्रो. निशा श्रीवास्तव
‘जिस तरह से आर्थिक नीतियां तय हो रहीं हैं, उससे यही लगता है कि मई दिवस सिंबल बन कर रह जाएगा। सरकारी, निजी दोनों क्षेत्रों में कर्मचारियों की नियुक्तियां संविदा पर हो रही हैं। जिसके कारण कर्मचारी यूनियनें खत्म हो रहीं हैं और कर्मचारियों का शोषण बढ़ता जा रहा है।’ समाजशास्त्री प्रो. ए. सत्यनारायण
प्रदेश में प्रतिदिन का निर्धारित न्यूनतम मानदेय
अकुशल- 254 रुपये
अर्द्धकुशल- 292 रुपये
कुशल- 315 रुपये
यह है वास्तविक स्थिति
खेतीहर मजदूर- 150 रुपये प्रतिदिन
मजदूरी- 200 रुपये प्रतिदिन
मिस्त्री- 250 रुपये प्रतिदिन
शापिंग मॉल्स समेत विभिन्न असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारी- 250 से 350 रुपये प्रतिदिन
‘पूरे परिवार की जिम्मेदारी मुझ पर है लेकिन मजदूरी इतनी भी नहीं मिलती है कि दोनों वक्त पेट भर भोजन मिल सके। अगर कुछ बच जाता है तो हफ्ते में एक बार बच्चों के लिए दूध का इंतजाम हो जाता है। बच्चों के नए कपड़े, अच्छा खाना और शौक पूरे करना तो सपने में भी नहीं सोच सकते।’
सूरज, मजदूर, छोटा बघाड़ा
‘मैं मध्य प्रदेश से रोजी-रोटी के लिए इलाहाबाद आया। चार-पाचं साल से शहर में मजदूरी कर रहा हूं। समय के साथ महंगाई भी तेजी से बढ़ी लेकिन मजदूरी नहीं। पहले दो वक्त की रोटी का इंतजाम आराम से हो जाता था लेकिन अब इसके लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है और मजदूरी में 12 से 13 घंटे का वक्त देना पड़ता है।’ बिकेश, मजदूर सिविल लाइंस
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हालात फिर पहले जैसे होते जा रहे हैं। 1886 में जो आंदोलन हुआ, वैसी ही पस्थितियां आज कहीं न कहीं फिर से बन रही है। पूंजीवाद बढ़ने के साथ ही असमानता की खाई और गहरी होती जा रही है। श्रम कानून तो बन गया लेकिन उसका लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच पा रहा। सेंट्रल ऑफ इंडिया ट्रेड यूनियन (सीटू) के जिलामंत्री हरिशचंद्र पांडेय का कहना है कि वर्तमान समय में मई दिवस की प्रासंगिकता काफी बढ़ गई है।
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असंगठित क्षेत्रों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की बात तो दूर, लोगों को उनके काम के बदले सम्मानजनक वेतन भी नहीं मिल रहा। मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी के प्रदेश सचिव डॉ. आशीष मित्तल का कहना है कि आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है। मई दिवस की क्रांति काम के निर्धारित आठ घंटे के साथ जीने लायक वेतन के लिए की गई थी। मगर आज भी स्थिति वही है।
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94 प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। नियमित नियुक्तियां खत्म होती जा रही हैं और आउट सोर्सिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। यही वजह है कि सरकार ने प्रतिदिन का जो न्यूनतम मानदेय निर्धारित कर रखा है, वह भी लोगों को नहीं मिल रहा। छह से दस हजार रुपये में पांच लोगों के परिवार को पूरा माह बिताना पड़ रहा है। इतने पैसे में तो माह भर का राशन और सब्जियां भी नहीं आएंगी। ऐसे में बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने और अन्य जरूरतों को पूरा कर पाने के बारे में सोचना भी बेमानी है।
‘पिछले पांच वर्षों में महंगाई में तीन गुना तक इजाफा हुआ है लेकिन उस हिसाब से लोगों की आय में बढ़ोतरी नहीं हुई। जिसका सीधा असर लोगों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। अपनी मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति के लिए भी लोग परेशान हैं। आर्थिक नीतियां और श्रम कानून भी आम लोगों के हित में नहीं है। इसमें सुधार न हुआ तो आने वाले समय में स्थितियां और भी भयावह हो जाएंगी।’ अर्थशास्त्री प्रो. निशा श्रीवास्तव
‘जिस तरह से आर्थिक नीतियां तय हो रहीं हैं, उससे यही लगता है कि मई दिवस सिंबल बन कर रह जाएगा। सरकारी, निजी दोनों क्षेत्रों में कर्मचारियों की नियुक्तियां संविदा पर हो रही हैं। जिसके कारण कर्मचारी यूनियनें खत्म हो रहीं हैं और कर्मचारियों का शोषण बढ़ता जा रहा है।’ समाजशास्त्री प्रो. ए. सत्यनारायण
प्रदेश में प्रतिदिन का निर्धारित न्यूनतम मानदेय
अकुशल- 254 रुपये
अर्द्धकुशल- 292 रुपये
कुशल- 315 रुपये
यह है वास्तविक स्थिति
खेतीहर मजदूर- 150 रुपये प्रतिदिन
मजदूरी- 200 रुपये प्रतिदिन
मिस्त्री- 250 रुपये प्रतिदिन
शापिंग मॉल्स समेत विभिन्न असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारी- 250 से 350 रुपये प्रतिदिन
‘पूरे परिवार की जिम्मेदारी मुझ पर है लेकिन मजदूरी इतनी भी नहीं मिलती है कि दोनों वक्त पेट भर भोजन मिल सके। अगर कुछ बच जाता है तो हफ्ते में एक बार बच्चों के लिए दूध का इंतजाम हो जाता है। बच्चों के नए कपड़े, अच्छा खाना और शौक पूरे करना तो सपने में भी नहीं सोच सकते।’
सूरज, मजदूर, छोटा बघाड़ा
‘मैं मध्य प्रदेश से रोजी-रोटी के लिए इलाहाबाद आया। चार-पाचं साल से शहर में मजदूरी कर रहा हूं। समय के साथ महंगाई भी तेजी से बढ़ी लेकिन मजदूरी नहीं। पहले दो वक्त की रोटी का इंतजाम आराम से हो जाता था लेकिन अब इसके लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है और मजदूरी में 12 से 13 घंटे का वक्त देना पड़ता है।’ बिकेश, मजदूर सिविल लाइंस