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कार्यकारिणी के गठन में फंसेगा पेच
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 02 Dec 2017 01:33 AM IST
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भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर जीत हासिल करके दूसरी बार महापौर की जिम्मेदारी संभालने जा रहीं अभिलाषा गुप्ता नंदी के लिए कई तरह की चुनौतियां भी होंगी। जिसमें प्राथमिकता के आधार पर जनसमस्याओं का निराकरण तो होगा ही नई कार्यकारिणी के गठन में पार्टी का बहुमत बनाना भी होगा। संख्या बल के हिसाब से नगर निगम में सपा के सर्वाधिक 24, भाजपा के 22, 18 निर्दलियों के साथ 11 कांग्रेस और बसपा के 3 और एक अन्य पार्टी के पार्षद हैं। ऐसे कार्यकारिणी गठन में पेच फंसना तय है। एडीए के सदस्य चुनाव के लिए भी कांटे का मुकाबला होगा।
नगर निगम में उपाध्यक्ष समेत 12 सदस्यीय कार्यकारिणी का गठन शपथ ग्रहण के बाद होने वाली पहली सदन की बैठक में ही होना है। कार्यकारिणी चुनाव में पार्षदों के साथ सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्यों के मत भी निर्णायक होते हैं। अभी तक की स्थिति में कार्यकारिणी में धुरंधर पुरनिए सपाई पार्षदों का वर्चस्व रहा है। इनके समर्थन में कुछ निर्दल पार्षद भी रहते हैं, जो कार्यकारिणी में शामिल होने के इच्छुक होते हैं। ऐसे में पार्टी की एकता को बनाए रखते हुए अधिक से अधिक भाजपा पार्षदों को कार्यकारिणी चुनाव में विजय दिलाना मुश्किल भरा काम होगा। पिछले कार्यकाल की कार्यकारिणी महापौर को उलझाने वाली थी और इस बार कुछ चेहरे बदले तो हैं, लेकिन मिनी सदन के इस प्रतिष्ठा वाले चुनाव में बहुमत हासिल करने का संकट हो सकता है। ऐसे में भाजपा पार्षदों की मजबूरी होगी कि वे कार्यकारिणी सदस्य बनने के लिए निर्दलीय पार्षदों को साध लें।
भाजपा के टिकट पर जीतकर आए कई ऐसे पार्षद हैं, जो सदन की चुनावी गणित में महिर हैं, लेकिन उनका महापौर से तालमेल कैसा रहेगा, यह संभावित कार्यकारिणी सदस्यों के चेहरों पर निर्भर करेगा। एक-एक वर्ष के लिए होने वाले इस चुनाव में साल भर बाद छह सदस्य बाहर हो जाते हैं। फिर नए सदस्यों को चुनाव होता है। क्रमश: यह प्रक्रिया चलती रहती है और छह-छह सदस्य चुनाव के जरिए बदलते रहते हैं।
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वहीं एडीए सदस्य बनने के लिए भी पार्षदों में मारामारी रहती है। पांच वर्ष के लिए होने वाले इस चुनाव के लिए भी मारामारी रहती है। शहर के विकास से सीधे जुड़ने के लिए अनुभवी पार्षदों में खींचतान रहती हैं। कार्यकारिणी के बाद यह चुनाव पार्षदों के लिए काफी प्रतिष्ठापरक माना जाता है। यह कार्यकारिणी चुनाव महापौर के राजनीतिक कौशल की पहली परीक्षा होगी क्योंकि इसमें क्रास वोटिंग की परिपाटी रही है।
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नगर निगम में उपाध्यक्ष समेत 12 सदस्यीय कार्यकारिणी का गठन शपथ ग्रहण के बाद होने वाली पहली सदन की बैठक में ही होना है। कार्यकारिणी चुनाव में पार्षदों के साथ सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्यों के मत भी निर्णायक होते हैं। अभी तक की स्थिति में कार्यकारिणी में धुरंधर पुरनिए सपाई पार्षदों का वर्चस्व रहा है। इनके समर्थन में कुछ निर्दल पार्षद भी रहते हैं, जो कार्यकारिणी में शामिल होने के इच्छुक होते हैं। ऐसे में पार्टी की एकता को बनाए रखते हुए अधिक से अधिक भाजपा पार्षदों को कार्यकारिणी चुनाव में विजय दिलाना मुश्किल भरा काम होगा। पिछले कार्यकाल की कार्यकारिणी महापौर को उलझाने वाली थी और इस बार कुछ चेहरे बदले तो हैं, लेकिन मिनी सदन के इस प्रतिष्ठा वाले चुनाव में बहुमत हासिल करने का संकट हो सकता है। ऐसे में भाजपा पार्षदों की मजबूरी होगी कि वे कार्यकारिणी सदस्य बनने के लिए निर्दलीय पार्षदों को साध लें।
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भाजपा के टिकट पर जीतकर आए कई ऐसे पार्षद हैं, जो सदन की चुनावी गणित में महिर हैं, लेकिन उनका महापौर से तालमेल कैसा रहेगा, यह संभावित कार्यकारिणी सदस्यों के चेहरों पर निर्भर करेगा। एक-एक वर्ष के लिए होने वाले इस चुनाव में साल भर बाद छह सदस्य बाहर हो जाते हैं। फिर नए सदस्यों को चुनाव होता है। क्रमश: यह प्रक्रिया चलती रहती है और छह-छह सदस्य चुनाव के जरिए बदलते रहते हैं।
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वहीं एडीए सदस्य बनने के लिए भी पार्षदों में मारामारी रहती है। पांच वर्ष के लिए होने वाले इस चुनाव के लिए भी मारामारी रहती है। शहर के विकास से सीधे जुड़ने के लिए अनुभवी पार्षदों में खींचतान रहती हैं। कार्यकारिणी के बाद यह चुनाव पार्षदों के लिए काफी प्रतिष्ठापरक माना जाता है। यह कार्यकारिणी चुनाव महापौर के राजनीतिक कौशल की पहली परीक्षा होगी क्योंकि इसमें क्रास वोटिंग की परिपाटी रही है।