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हिंदू वैध विवाह में आवश्यक है सप्तपदी संस्कार: हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हिंदू कानून के अनुसार वैध शादी के लिए दूल्हे और दुल्हन को अग्नि के सामने सात फेरे लेना (सप्तपदी) आवश्यक है। द्विविवाह के एक मामले में जारी समन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को कोर्ट ने स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की कोर्ट ने आगरा की निशा की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। मामले में संशोधनवादी निशा के पति ने थाना सिकंदरा, जिला आगरा में धमकी देने, अपमानित करने व पति को तलाक दिए बिना दूसरी शादी करने (धारा 494) के आरोप में केस दर्ज कराया था। संबंधित अदालत ने 20 फरवरी 2023 को निशा के खिलाफ समन आदेश जारी कर दिया। इसके विरोध में संशोधनवादी ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई।
संशोधनवादी के अधिवक्ता ने कहा कि निशा पहले पति से अलग रह रहीं हैं। उसने पति व उसके परिवार के खिलाफ विभिन्न धाराओं में जिला आगरा में केस दर्ज कराया था। जवाबी कार्रवाई में उसके पति ने वर्तमान शिकायत दर्ज कराई है। साथ ही कहा कि इस तथ्य के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है कि युवती ने कौन से संस्कार, समारोह, रीति-रिवाज के साथ कथित दूसरी शादी की है। साथ ही गवाहों की बयानों में विवाह के ''''अनुष्ठान'''' और ''''सप्तपदी'''' समारोह का कोई जिक्र नहीं है। इस लिए युवती के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
कोर्ट ने पक्षों के की दलीलें सुनने के बाद कहा कि हिंदू कानून के तहत ''''सप्तपदी'''' समारोह वैध विवाह के लिए आवश्यक है, लेकिन वर्तमान मामले में उक्त साक्ष्य का अभाव है। दूसरी शादी के आरोप को पुष्ट करने के लिए उपयुक्त साक्ष्य का अभाव है। इसलिए संशोधनकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने समन आदेश रद्द कर दिया। साथ ही कहा कि अन्य प्रावधानों में संशोधनवादी के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई चलती रहेंगी। कोर्ट ने आंशिक रूप से याचिका स्वीकार की।
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संशोधनवादी के अधिवक्ता ने कहा कि निशा पहले पति से अलग रह रहीं हैं। उसने पति व उसके परिवार के खिलाफ विभिन्न धाराओं में जिला आगरा में केस दर्ज कराया था। जवाबी कार्रवाई में उसके पति ने वर्तमान शिकायत दर्ज कराई है। साथ ही कहा कि इस तथ्य के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है कि युवती ने कौन से संस्कार, समारोह, रीति-रिवाज के साथ कथित दूसरी शादी की है। साथ ही गवाहों की बयानों में विवाह के ''''अनुष्ठान'''' और ''''सप्तपदी'''' समारोह का कोई जिक्र नहीं है। इस लिए युवती के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
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कोर्ट ने पक्षों के की दलीलें सुनने के बाद कहा कि हिंदू कानून के तहत ''''सप्तपदी'''' समारोह वैध विवाह के लिए आवश्यक है, लेकिन वर्तमान मामले में उक्त साक्ष्य का अभाव है। दूसरी शादी के आरोप को पुष्ट करने के लिए उपयुक्त साक्ष्य का अभाव है। इसलिए संशोधनकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने समन आदेश रद्द कर दिया। साथ ही कहा कि अन्य प्रावधानों में संशोधनवादी के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई चलती रहेंगी। कोर्ट ने आंशिक रूप से याचिका स्वीकार की।
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