Mahakumbh : यम नियमों के साथ साधु-संत एवं गृहस्थों ने लगाई त्रिजटा डुबकी, दिन भर चलता रहा स्नान का क्रम
फाल्गुन तृतीया पर शनिवार को साधु-संतों के साथ गृहस्थों ने भी संगम की पवित्र धारा में त्रिजटा स्नान किया। स्नान-ध्यान का क्रम तड़के से आरंभ होकर पूरे दिन चला। डुबकी के साथ महीने भर के कल्पवास और स्नान, ध्यान का पुण्य फल अर्जित किया।
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फाल्गुन तृतीया पर शनिवार को साधु-संतों के साथ गृहस्थों ने भी संगम की पवित्र धारा में त्रिजटा स्नान किया। स्नान-ध्यान का क्रम तड़के से आरंभ होकर पूरे दिन चला। डुबकी के साथ महीने भर के कल्पवास और स्नान, ध्यान का पुण्य फल अर्जित किया। इस आखिरी स्नान के साथ कल्पवासियों की शेष बची खेप ने भी कुंभ नगरी से विदाई ले ली। इसी के साथ माघी पूर्णिमा के बाद बचे शिविर भी खुलने आरंभ हो गए। त्रिजटा स्नान के साथ ही तंबुओं को समेटने का काम तेज हो गया।
शनिवार तड़के से संगम पर त्रिजटा स्नान को श्रद्धालुओं का तांता लगना आरंभ हो गया। त्रिजटा स्नान की खातिर बड़ी संख्या में कल्पवासी समेत साधु-संत पूर्णिमा के बाद भी कुंभनगरी में डटे रहे। मान्यता है कि माघ मास में स्नान न कर पाने पर त्रिजटा स्नान करने से उसका कल्पवास के तरह फल मिलता है। जो माह भर संगम में डुबकी नहीं लगा पाते, वह इस तिथि पर स्नान करके पूरे माह कल्पवास का फल अर्जित कर लेते हैं। इसी मान्यता के चलते भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने संगम की डुबकी लगाई।
भगवान भाष्कर को अर्ध्य अर्पित करने के साथ ही दान एवं ध्यान किया। कहीं ग्रामीण अंचलों से आईं महिलाओं ने मां गंगा के गीत गाते हुए डुबकी लगाई, तो कहीं दीपदान के साथ मां गंगा का दुग्ध से अभिषेक हुआ। त्रिजटा स्नान के बाद आखिरी बची खेप भी कुंभनगरी से वापस लौटना आरंभ हो गई। अब कल्पवासियों की बसावट वाले सेक्टर तकरीबन खाली हो गए हालांकि अभी खाक चौक में कुछ संतों के शिविर शिवरात्रि स्नान तक रहेंगे। दंडीबाड़ा, आचार्य बाड़ा में रुके संन्यासी त्रिजटा स्नान के साथ ही अपने आश्रम की ओर रवाना हो गए।
त्रिजटा राक्षसी के नाम पर स्नान को मान्यता
दंडी संन्यासी विजयानंद सरस्वती के मुताबिक मां सीता के वरदान की वजह से त्रिजटा स्नान की मान्यता मिली। सीता का हरण करके रावण ने उनको अशोक वाटिका में रखा था। यहां उनकी सुरक्षा को त्रिजटा नामक राक्षसी को लगाया गया था। त्रिजटा ने मां सीता की सेवा की। इससे प्रसन्न होकर मां सीता ने त्रिजटा को आशीष दिया। उसको दिए वरदान के मुताबिक ही त्रिजटा स्नान को मान्यता मिली।