{"_id":"5852f2e34f1c1b310e649743","slug":"sacred-house-of-the-great-spirits-cathedral-of-all-saints","type":"story","status":"publish","title_hn":"महान आत्माओं का पवित्र घर ‘ऑल सेंट्स कैथिड्रल’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महान आत्माओं का पवित्र घर ‘ऑल सेंट्स कैथिड्रल’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 16 Dec 2016 01:41 AM IST
विज्ञापन
इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर के गिरजाघरों की गौरवशाली परंपरा को समृद्ध करने में सिविल लाइंस स्थिति ऑल सेंट्स कैथिड्रल का अहम स्थान है। इसे महान आत्माओं का पवित्रघर कहा जाता है। यह मसीहियों की श्रद्धा का केन्द्र होने के साथ ही दुनिया भर के खूबसूरत चर्चों में से एक है। कैथिड्रल की लम्बाई130 फीट और चौड़ाई 40 फीट है। बाहरी बरामदे को जोड़ने से चौड़ाई 56 फीट हो जाती है।
प्रवेश द्वारों पर आकर्षक कारीगरी की गई है। पश्चिम के मुख्य प्रवेश द्वार पर बने गोलाकार रोशनदान में स्टेंड ग्लास लगे हैं, जिसकी डिजाइन कार्ले चैत्यद्वार की तरह है। बाकी हिस्से के स्थापत्य में फतेहपुर सीकरी का प्रभाव दिखता है। बिशप थ्रोन पर की गई चित्रकारी से वैभव शाली प्रभाव दिखता है। भवन में लगे स्टेंड ग्लास अब तक मूल रूप में लगे हैं। प्रार्थना स्थल मुख्य आकर्षक संगमरमर से बना है जिसके ऊपर पूर्व के रोशनदान से छनकर सूर्य की रोशनी पड़ती है। एकाश्म संगमरमर का बना कलात्मक जलपात्र है जिसमें मसीही बच्चों का बपित्समा किया जाता है।
गोथिक शैली का यह कैथिड्रल 10 अप्रैल 1871 में बनना शुरू हुआ। इसके निर्माण में चालीस वर्ष का समय लगा। इसके बावजूद यह अब तक अधूरा है। दरअसल चर्च के प्रस्तावित मॉडल के मुताबिक पश्चिमी ओर दो स्तंभों का निर्माण होना था लेकिन किन्हीं कारणों से सिर्फ चबूतरे ही बन पाए। कैथिड्रल के पल्ली पुरोहित फादर गैब्रियल दाऊद का कहना है कि इस अधूरे चर्च को पूरा करने के प्रयास जारी है लेकिन इसके लिए कुशल कारीगर नहीं मिल रहे हैं। कारीगरों के मिलने पर अधूरे चर्च को पूर्णता मिल सकेगी।
विज्ञापन
आल सेंट्स कैथिड्रल को दरअसल आस्ट्रिया में बनाया जाना था। इसका नक्शा तैयार करके आस्ट्रिया के लिए भेजा गया था लेकिन नक्शा गलती से भारत आ गया। ऐसे मेेें इसे इलाहाबाद में बनाए जाने का निर्णय हुआ। तत्कालीन गवर्नर की पत्नी एलिजाबेथ म्योर ने इसकी नींव रखी थी। क्रिसमस के दिन कैंडल जलाकर यहां विशेष प्रार्थना की जाती है।
विज्ञापन
प्रवेश द्वारों पर आकर्षक कारीगरी की गई है। पश्चिम के मुख्य प्रवेश द्वार पर बने गोलाकार रोशनदान में स्टेंड ग्लास लगे हैं, जिसकी डिजाइन कार्ले चैत्यद्वार की तरह है। बाकी हिस्से के स्थापत्य में फतेहपुर सीकरी का प्रभाव दिखता है। बिशप थ्रोन पर की गई चित्रकारी से वैभव शाली प्रभाव दिखता है। भवन में लगे स्टेंड ग्लास अब तक मूल रूप में लगे हैं। प्रार्थना स्थल मुख्य आकर्षक संगमरमर से बना है जिसके ऊपर पूर्व के रोशनदान से छनकर सूर्य की रोशनी पड़ती है। एकाश्म संगमरमर का बना कलात्मक जलपात्र है जिसमें मसीही बच्चों का बपित्समा किया जाता है।
विज्ञापन
गोथिक शैली का यह कैथिड्रल 10 अप्रैल 1871 में बनना शुरू हुआ। इसके निर्माण में चालीस वर्ष का समय लगा। इसके बावजूद यह अब तक अधूरा है। दरअसल चर्च के प्रस्तावित मॉडल के मुताबिक पश्चिमी ओर दो स्तंभों का निर्माण होना था लेकिन किन्हीं कारणों से सिर्फ चबूतरे ही बन पाए। कैथिड्रल के पल्ली पुरोहित फादर गैब्रियल दाऊद का कहना है कि इस अधूरे चर्च को पूरा करने के प्रयास जारी है लेकिन इसके लिए कुशल कारीगर नहीं मिल रहे हैं। कारीगरों के मिलने पर अधूरे चर्च को पूर्णता मिल सकेगी।
विज्ञापन
आल सेंट्स कैथिड्रल को दरअसल आस्ट्रिया में बनाया जाना था। इसका नक्शा तैयार करके आस्ट्रिया के लिए भेजा गया था लेकिन नक्शा गलती से भारत आ गया। ऐसे मेेें इसे इलाहाबाद में बनाए जाने का निर्णय हुआ। तत्कालीन गवर्नर की पत्नी एलिजाबेथ म्योर ने इसकी नींव रखी थी। क्रिसमस के दिन कैंडल जलाकर यहां विशेष प्रार्थना की जाती है।