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रिहायशी प्लॉट का मुआवजा मार्कट रेट से देने का आदेश

Sun, 28 Jul 2019 01:42 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Sun, 28 Jul 2019 01:42 AM IST
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Residential Plot compensation to be ordered from the mark rate
Residential Plot compensation to be ordered from the mark rate
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ताजनगरी फेज-टू में रिहायशी कालोनी की भूमि का मुआवजा मार्केट रेट से देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने फेज वन व्यवसायिक कालोनी से तुलना कर मुआवजा देने को सही नहीं माना है और कहा कि सटी हुई जमीन के मार्केट रेट के आधार पर ही मुआवजा तय किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा-23 के तहत मुआवजे के निर्धारण के लिए जमीन का मार्केट रेट अधिसूचना के गजट में प्रकाशन की तिथि के आधार पर तय किया जाएगा। नोटिस जारी होने की तिथि का मुआवजा निर्धारण दर तय करने में कोई महत्व नहीं है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी ने आगरा विकास प्राधिकरण की तरफ से दाखिल 19 अपीलों को स्वीकार करते हुए दिया है। प्राधिकरण ने अधिक दर पर मुआवजा देने के जिला जज आगरा के आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा है कि मुआवजा राशि गणितीय आधार पर तय करना जरूरी नहीं है। कई नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं पर विचार करके ही राशि तय की जाएगी। आसपास की जमीन के उच्चतम दर को मुआवजा राशि तय तय करते समय ध्यान में रख कर दर तय की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा राशि निर्धारण के समय कलेक्टर को जमीन की भौगोलिक स्थिति, जमीन की तात्कालिक उपयोगिता, भविष्य की उपयोगिता में विकास, एवं आसपास की जमीनों के बाजारी मूल्य को देखते हुए निर्णय लेना होगा। इसमें जमीन के विकास की लागत भी जोड़ी जाएगी।
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कोर्ट ने कहा व्यवसायिक प्लॉट की दर रिहायशी प्लाटों के लिए तय मानक नहीं बन सकती। विकसित प्लाटों की तुलना अविकसित प्लाटों से नहीं की जा सकती। जमीन के एक हिस्से का बैनामा मूल्य निर्धारण का उदाहरण हो सकता है। अधीनस्थ कोर्ट द्वारा बैनामे के बजाए लीज डीड के आधार पर मुआवजा तय करने के आदेश को हाईकोर्ट ने सही नहीं माना और पुनर्विचार कर नियमानुसार निर्णय लेने के निर्देश के साथ प्रकरण जिला न्यायाधीश को वापस कर दिया है। कोर्ट ने 6 माह में मामले का निस्तारण करने का भी निर्देश दिया है। मालूम हो कि आगरा के बसई मुस्तकिल, टोरा, चमरोली और लकवली गांव की 734.50 एकड़ जमीन ताज नगरी फेज टू योजना के लिए चार अप्रैल 1989 को अधिगृहीत की गई। इसके मुआवजे का निर्धारण करने के लिए अपीलें दाखिल की गई थी।
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