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High Court : बीटीसी अभ्यर्थियों को राहत, नियुक्ति तक स्टाइपेंड का हक नहीं छीन सकती सरकार

Sat, 16 May 2026 04:42 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 16 May 2026 04:42 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2004 के स्पेशल बीटीसी प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। कहा है कि सरकार मूल शासनादेश में स्टाइपेंड (वजीफा) के लाभ को बाद के एक साधारण संशोधन (कोरिजेंडम) से खत्म नहीं कर सकती।

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Relief to BTC candidates, government cannot take away the right to stipend till appointment
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2004 के स्पेशल बीटीसी प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। कहा है कि सरकार मूल शासनादेश में स्टाइपेंड (वजीफा) के लाभ को बाद के एक साधारण संशोधन (कोरिजेंडम) से खत्म नहीं कर सकती। सरकार के 14 जनवरी 2004 के शासनादेश में चयनितों को प्रशिक्षण शुरू होने से नियुक्ति तक 2500 रुपये प्रतिमाह स्टाइपेंड देने का स्पष्ट प्रावधान था। यह अभ्यर्थियों का अर्जित अधिकार बन चुका था।

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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने अश्वनी कुमार अवस्थी व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की। याचियों ने 14 मई 2015 के कोरिजेंडम और उनके दावे खारिज करने वाले आदेशों को चुनौती दी थी।अधिवक्ता ने दलील दी कि 14 जनवरी 2004 का शासनादेश राज्यपाल की स्वीकृति से जारी हुआ था। उसमें कहा गया था कि चयनितों को प्रशिक्षण शुरू होने से लेकर नियुक्ति तक स्टाइपेंड मिलेगा। 20 फरवरी 2004 के शासनादेश से संशोधन किए गए पर स्टाइपेंड संबंधी व्यवस्था बरकरार रखी गई।
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14 मई 2015 का कोरिजेंडम केवल स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि मूल नीति में बड़ा बदलाव था। नियुक्ति तक स्टाइपेंड का अधिकार केवल प्रशिक्षण अवधि तक कर दिया गया। ऐसा बदलाव बिना राज्यपाल की स्वीकृति के नहीं किया जा सकता। इसी मामले में पहले भी कई याचिकाएं दाखिल हुई थीं। हाईकोर्ट ने 2014 में प्रशिक्षुओं के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे विशेष अपील में भी बरकरार रखा गया। बाद में राज्य सरकार की एसएलपी और पुनर्विचार याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी।
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राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि 14 मई 2015 का कोरिजेंडम केवल स्पष्टीकरण था। इसके लिए अलग से राज्यपाल की मंजूरी आवश्यक नहीं थी। सरकार ने अनुच्छेद-166 (राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और कार्य संचालन से संबधित) व उत्तर प्रदेश सचिवालय के निर्देशों का हवाला दिया। कहा कि विभागीय स्तर पर ऐसे स्पष्टीकरण जारी हो सकते हैं।कोर्ट ने कहा कि साधारण प्रशासनिक या स्पष्टीकरण आदेश और किसी नीति में मौलिक परिवर्तन के बीच स्पष्ट अंतर है। यदि किसी आदेश से अर्जित अधिकार प्रभावित होते हैं तो उसे मात्र कोरिजेंडम नहीं माना जा सकता।

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