सनातनी धर्माचार्यों के निर्देशन में शास्त्रोक्त विधि से बने मंदिर : स्वामी स्वरूपानंद
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ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का कहना है कि वेद शास्त्रों के अनुसार चलने वाला ही सनातनधर्मी है। जहां वेद शास्त्र के अनुसार काम न हो रहा हो, वहां देवत्व का आगमन असंभव है। धर्मशास्त्रों और वास्तु आदि की उपेक्षा कर बनाए गए ढांचे में देवत्व की आशा व्यर्थ है। हरिहर संत सम्मेलन में बतौर अध्यक्ष उन्होंने कहा कि सनातनधर्मी एक बार पुन: छद्म हिंदुओं से छले जा रहे हैं। पांच सौ वर्षों से तीन लाख बलिदान के बाद अब अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि में शास्त्रोक्त मंदिर बनाने के प्रयासों को चतुराई से बदला जा रहा है, जिस पर रोक जरूरी है। यदि सनातनी अभी चूके तो सदा के लिए चूक जायेंगे।
शंकराचार्य जी ने गुरु गोलवलकर की ओर से लिखी विचार नवनीत पुस्तक के उन अंशों को भी उद्घृत किया जिसमें श्रीराम जी को महापुरुष सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। बोले, अपने को हिंदू, हिंदू कहकर कई ऐसी संस्थाएं जो वेद शास्त्रों को मानती ही नहीं हैं। आगे आकर और सत्ता में होने का लाभ उठाकर मंदिर और उसके प्रांगण को अपने कार्यालय की तरह विकसित करती जा रही हैं। वास्तविकता यह है कि मंदिर निर्माण में लगी संस्थाएं श्रीराम को परब्रह्म परमात्मा तो दूर भगवान भी नहीं मानतीं। इसी मान्यता को उन्होंने कई वर्ष पूर्व इसी प्रयागराज में हुए अधिवेशन में रामजी के कटआउट को डा.आंबेडकर और स्वामी विवेकानंद के समकक्ष खड़ा करके प्रदर्शित भी किया।