Prayagraj : अतीक की सियासत के ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ राजूपाल हत्याकांड
अतीक अहमद का सियासी सफर 1989 में शुरू हुआ। शौक ए इलाही उर्फ चांद बाबा की हत्या के बाद खाैफ इस कदर कायम हुआ कि उसके खिलाफ सिर उठाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया। यह वह साल था जिसमें पहली बार उसने निर्दलीय विधायकी का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर विधानसभा में पहुंच गया।
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बसपा विधायक राजू पाल की हत्या अतीक अहमद के सियासी सफर के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। दिनदहाड़े हुए इस हत्याकांड के बाद अतीक कभी कोई चुनाव नहीं जीत पाया। यहां तक कि जिस शहर पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र में लगातार 15 सालों तक उसकी बादशाहत कायम रही, वहां की जनता ने भी उसे नकार दिया।
अतीक अहमद का सियासी सफर 1989 में शुरू हुआ। शौक ए इलाही उर्फ चांद बाबा की हत्या के बाद खाैफ इस कदर कायम हुआ कि उसके खिलाफ सिर उठाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया। यह वह साल था जिसमें पहली बार उसने निर्दलीय विधायकी का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर विधानसभा में पहुंच गया। इसके बाद लगातार दो बार विधानसभा चुनावों में उसने बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीत दर्ज की।
1996 में उसने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और चौथी बार विधायक बना। उसकी बादशाहत लगातार पांचवीं बार भी कायम रहीं और 2002 में उसने अपना दल के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायकी हासिल की। इस तरह 1989 से 2004 तक लगातार 15 सालों तक शहर पश्चिमी सीट पर उसकी तूती बोलती रही।
2004 में फूलपुर से चुनाव जीतकर पहुंचा संसद
पांच बार विधायक बनने के बाद 2004 में उसने फूलपुर संसदीय सीट से बतौर सपा प्रत्याशी चुनाव लड़ा और पहली बार में ही लोकसभा का सदस्य बन गया। हालांकि, यह वही साल था, जिसमें हुए उपचुनाव में राजू पाल ने माफिया के भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ को हराकर शहर पश्चिमी की सीट उससे छीन ली। शहर पश्चिमी सीट पर हुई इस हार को महज चुनाव में मिली हार नहीं बल्कि अतीक ने अपनी बेइज्जती समझी और इसके तीन महीने बाद ही राजू पाल की हत्या कर दी गई। राजूपाल की हत्या अतीक के सियासी सफर के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। नतीजा यह हुआ कि इसके बाद अतीक कभी कोई चुनाव नहीं जीत पाया।
एक विधानसभा, तीन लोकसभा चुनावों में मिली पटखनी
राजू पाल की हत्या के बाद अतीक ने एक विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाई लेकिन हर बार उसे पटखनी मिली। 2009 में उसने प्रतापगढ़ सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा। 2014 में उसने सपा के टिकट पर श्रावस्ती से दांव आजमाया लेकिन वहां भी हार ही मिली। 2019 में उसने वाराणसी संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन उसे बुरी तरह शिकस्त का सामना करना पड़ा।