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Prayagraj News: उच्च शिक्षा निदेशालय में कार्यवाहक की तैनाती व्यवस्था पर उठे सवाल, शासनादेश के उल्लंघन का आरोप

Sun, 07 Jun 2026 02:57 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 07 Jun 2026 02:57 PM IST
सार

प्रदेश का उच्च शिक्षा निदेशालय प्रयागराज इन दिनों कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे संचालित हो रहा है। उच्च शिक्षा निदेशक स्वयं कार्यवाहक के रूप में कार्यरत हैं।

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Questions raised on the deployment system of acting in the Directorate of Higher Education
शिक्षा निदेशालय। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

प्रदेश का उच्च शिक्षा निदेशालय प्रयागराज इन दिनों कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे संचालित हो रहा है। उच्च शिक्षा निदेशक स्वयं कार्यवाहक के रूप में कार्यरत हैं। हाल ही में प्रदेश के विभिन्न मंडलों में 11 से अधिक क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारियों की तैनाती भी अस्थायी एवं कार्यवाहक आधार पर किए जाने से विभागीय हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कारण प्रोफेसर पदनाम वाले को स्थायी प्राचार्य के पद पर नियुक्ति दिया जाना शासनादेश का उल्लंघन है।

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सूत्रों के अनुसार, शासन ने अगस्त 2025 में प्रदेश के मंडलों में क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी के पद सृजित करने का निर्णय लिया था। प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट किया गया था कि इन पदों को उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा नियमावली-1985 के प्रावधानों के अनुरूप राजकीय महाविद्यालयों के प्राचार्यों के स्थानांतरण के माध्यम से भरा जाएगा।
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हालांकि हाल में जारी तैनाती आदेशों में कई शिक्षकों को पदोन्नति की प्रतीक्षा के बीच अस्थायी रूप से क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी का दायित्व सौंपा गया है। आदेश में यह भी उल्लेख है कि प्राचार्य पद पर पदोन्नति बाधित होने के कारण यह व्यवस्था की गई है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि उच्चतर शिक्षा सेवा नियमावली-1985 के तहत प्रशासनिक संरचना में निदेशक, स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य, स्नातक महाविद्यालय के प्राचार्य और शिक्षक शामिल हैं।

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आठ वर्षों से नहीं हुई है डीपीसी की बैठक

नियमों के अनुसार पदोन्नति की क्रमिक व्यवस्था निर्धारित है। ऐसे में कार्यवाहक तैनाती को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विवाद की एक वजह वर्ष 2016 का शासनादेश भी बताया जा रहा है। उस समय शासन ने निर्णय लिया था कि राजकीय एवं सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के प्राचार्यों को प्राचार्य के साथ प्रोफेसर का पदनाम भी दिया जाएगा। शासन का तर्क था कि प्राचार्य और प्रोफेसर दोनों का वेतनमान एवं ग्रेड पे समान है।

प्राचार्य पद के लिए अपेक्षित अनुभव प्रोफेसर की तुलना में अधिक है। दरअसल पदनाम इसलिए समकक्ष मानने कि अनुमति प्रदान की गई, जिससे कि प्रोफेसर पदनाम न होने के कारण महाविद्यालयों के स्थायी प्राचार्य विभिन्न समितियों में सदस्य बनने से वंचित न रह जाएं। उधर, विभाग में लंबे समय से नियमित पदोन्नति न होने की भी चर्चा है। करीब आठ वर्षों से विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक नहीं हो सकी है, जिससे कई पदों पर नियमित नियुक्तियां लंबित हैं।

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