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नहीं रहे उर्दू अदब के जानेमाने आलोचक प्रो.अकील रिजवी
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Prof Aqeel rizvi, renound Urdu critics
- फोटो : CITY DESK
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देर शाम दरियाबाद कब्रिस्तान में हुए सुपुर्दे खाक
आखिरी सलाम कहने के लिए जुटे शागिर्द,करीबी
प्रयागराज। उर्दू अदब के जानेमाने आलोचक प्रो.अकील रिज़वी नहीं रहे। शुक्रवार को दिन में तकरीबन डेढ़ बजे अपने दरियाबाद स्थित आवास पर ही उन्होंने अंतिम सांस ली। वह तकरीबन 91 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ थे। देर शाम को दरियाबाद स्थित कब्रिस्तान में ही उन्हें सुपुर्दे खाक किया गया। इससे पहले दरगाह हजरत अब्बास में नमाजे जनाजा हुई।
तकरीबन पखवाड़े भर पहले तबीयत बिगड़ने पर उन्हें सिविल लाइंस स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन तकरीबन सप्ताह भर पहले डॉक्टरों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी। शुक्रवार को दोपहर में छोटी बेटी अफ्शां उनके लिए कुछ लाने को उठीं लेकिन लौटीं तो पापा की सांसें थम चुकी थीं। बेटे प्रो.जहीर बाबर टोरंटो, कनाड़ा में हैं। अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहीं बड़ी बेटी प्रो.रेशमा अकील का कैंसर से निधन होने के बाद डॉ.अकील भीतर से टूट गए थे। बाद में पत्नी के जाने से वह एकदम अकेले हो गए। दो बेटियां ही उनकी देखभाल करती रहीं।
घर और कब्रिस्तान पहुंचने के अतिरिक्त उन्हें आखिरी सलाम कहने वालों में प्रो.अली अहमद फातमी, प्रो.,संतोष भदौरिया, असरार गांधी, नीलम शंकर, डॉ.फखरुल करीम, डॉ.फाजिल हाशमी, प्रो.नीलम सरन, सुरेंद्र राही, प्रो.अनीता गोपेश, यश मालवीय, डॉ.ताहिरा परवीन, मददगार रिज़वी,
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भतीजे डॉ.अली हैदर रिज़वी सहित तमाम शिक्षक, शिष्य, करीबी शामिल रहे।
उर्दू तथा हिंदी दोनों को आहत कर गया अदबदोस्त अकील का जाना
-उनकी देखरेख में तीस शागिर्दों ने हासिल की पीएचडी
-तीन दशकों तक रहे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष
प्रयागराज। प्रगतिशील आलोचकों की पहली पीढ़ी की अंतिम कड़ी प्रो.अकील रिजवी का जाना उर्दू अदब ही नहीं हिन्दी जगत को भी आहत कर गया है। वर्ष 1928 में करारी मंझनपुर में जन्मे अकील रिजवी की पूरी पढ़ाई इलाहाबाद में ही हुई। ईसीसी से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और एमए करने के बाद ही उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया। वर्ष 1953 से 90 तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया। फिराक गोरखपुरी के शागिर्द रहे प्रो.अकील की देखरेख में तकरीबन तीस शागिर्दों ने पीएचडी की उपाधि हासिल की। उन्होंने तकरीबन तीस किताबें लिखीं, जिसमें उनकी आत्मकथा ‘गऊधूलि’काफी चर्चित रही।
प्रोफेसर एहतेशाम हुसैन के सानिध्य में उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना के अर्थ जाने। व्याख्यान के लिए वह लंदन, पेरिस, ताशकंद भी गए। सरदार जाफरी, सज्जाद जहीर के साथ रहे प्रो.अकील प्रगतिशील लेखक संघ की इलाहाबाद इकाई के तीन दशकों तक अध्यक्ष रहे। अमरकांत और प्रो.ओपी मालवीय के दोस्त रहे प्रो.अकील का उर्दू के साथ ही हिन्दी से भी गहरा नाता रहा। हालांकि जब तक वह सक्रिय रहे, आयोजनों में पूरी शिद्तत से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे।
अच्छे नक्काद ही नहीं कामयाब उस्ताद भी
प्रो.अकील रिजवी प्रगतिशील आंदोलन के अग्रणी थे। प्रगतिशील लेखन में उन्होंने जबर्दस्त काम किया। इसे आगे बढ़ाया। वह जितने अच्छे नक्काद थे, उतने ही अच्छे अध्यापक भी। उनके शागिर्दों की लंबी फेहरिस्त है। कामयाब उस्ताद की यही पहचान होती है। वह जब तक सक्रिय रहे, अदबी कार्यक्रमों में शिद्दत से शामिल होते रहे। उनका जाना बहुत दुखद है। -पद्श्री शम्सुर्रहमान फारूकी
भाषा के संस्कार पर देते थे ध्यान
प्रो.अकील रिजवी उर्दू अदब का ऐसा नाम रहा जिन्हें हिंदी के लोगों का भी बहुत स्नेह और सम्मान मिला। वह सिर्फ इलाहाबाद ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर थे। वह भाषा के बारे में बहुत सावधान रहते थे। जब भी वह यात्रा पर निकलते थे, तो भाषा के संस्कार पर बातें करते रहते थे। कौन का शब्द किस भाषा से आया, इस पर उनका बड़ा काम है। उनका जाना उर्दू अदब का बड़ा नुकसान है।वह गंगा-जमुनी तहजीब के एक बडे़ पैरोकार भी थे। आमतौर पर उर्दू में आत्मकथाएं कम लिखी गई हैं लेकिन प्रो.अकील की आत्मकथा गऊधूलि काफी चर्चित रही। हिन्दी उर्दू दोस्ती के तौर पर भी उन्हें याद किया जाएगा। -प्रो.राजेंद्र कुमार, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, इविवि.
चला गया तरक्कीपसंद तहरीक का हमसफर
प्रो.अकील रिजवी का इंतकाल एक सदमा लेकर आया है। उनके होने से हौसला बना रहता था। वह प्रलेस के सरपरस्त थे। तरक्की पसंद तहरीक में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा। उर्दू अदब खासकर उर्दू आलोचना को उन्होंने बहुत समृद्ध किया। आजादी के बाद के इलाहाबाद की तारीख में उनका खास मुकाम है। इलाहाबाद की अदबी दुनिया उनके जाने से विपन्न हुई है। बहुत दुखी और परेशान हूं। -प्रो.संतोष भदौरिया, हिंदी विभाग, इविवि
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आखिरी सलाम कहने के लिए जुटे शागिर्द,करीबी
प्रयागराज। उर्दू अदब के जानेमाने आलोचक प्रो.अकील रिज़वी नहीं रहे। शुक्रवार को दिन में तकरीबन डेढ़ बजे अपने दरियाबाद स्थित आवास पर ही उन्होंने अंतिम सांस ली। वह तकरीबन 91 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ थे। देर शाम को दरियाबाद स्थित कब्रिस्तान में ही उन्हें सुपुर्दे खाक किया गया। इससे पहले दरगाह हजरत अब्बास में नमाजे जनाजा हुई।
तकरीबन पखवाड़े भर पहले तबीयत बिगड़ने पर उन्हें सिविल लाइंस स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन तकरीबन सप्ताह भर पहले डॉक्टरों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी। शुक्रवार को दोपहर में छोटी बेटी अफ्शां उनके लिए कुछ लाने को उठीं लेकिन लौटीं तो पापा की सांसें थम चुकी थीं। बेटे प्रो.जहीर बाबर टोरंटो, कनाड़ा में हैं। अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहीं बड़ी बेटी प्रो.रेशमा अकील का कैंसर से निधन होने के बाद डॉ.अकील भीतर से टूट गए थे। बाद में पत्नी के जाने से वह एकदम अकेले हो गए। दो बेटियां ही उनकी देखभाल करती रहीं।
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घर और कब्रिस्तान पहुंचने के अतिरिक्त उन्हें आखिरी सलाम कहने वालों में प्रो.अली अहमद फातमी, प्रो.,संतोष भदौरिया, असरार गांधी, नीलम शंकर, डॉ.फखरुल करीम, डॉ.फाजिल हाशमी, प्रो.नीलम सरन, सुरेंद्र राही, प्रो.अनीता गोपेश, यश मालवीय, डॉ.ताहिरा परवीन, मददगार रिज़वी,
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भतीजे डॉ.अली हैदर रिज़वी सहित तमाम शिक्षक, शिष्य, करीबी शामिल रहे।
उर्दू तथा हिंदी दोनों को आहत कर गया अदबदोस्त अकील का जाना
-उनकी देखरेख में तीस शागिर्दों ने हासिल की पीएचडी
-तीन दशकों तक रहे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष
प्रयागराज। प्रगतिशील आलोचकों की पहली पीढ़ी की अंतिम कड़ी प्रो.अकील रिजवी का जाना उर्दू अदब ही नहीं हिन्दी जगत को भी आहत कर गया है। वर्ष 1928 में करारी मंझनपुर में जन्मे अकील रिजवी की पूरी पढ़ाई इलाहाबाद में ही हुई। ईसीसी से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और एमए करने के बाद ही उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया। वर्ष 1953 से 90 तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया। फिराक गोरखपुरी के शागिर्द रहे प्रो.अकील की देखरेख में तकरीबन तीस शागिर्दों ने पीएचडी की उपाधि हासिल की। उन्होंने तकरीबन तीस किताबें लिखीं, जिसमें उनकी आत्मकथा ‘गऊधूलि’काफी चर्चित रही।
प्रोफेसर एहतेशाम हुसैन के सानिध्य में उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना के अर्थ जाने। व्याख्यान के लिए वह लंदन, पेरिस, ताशकंद भी गए। सरदार जाफरी, सज्जाद जहीर के साथ रहे प्रो.अकील प्रगतिशील लेखक संघ की इलाहाबाद इकाई के तीन दशकों तक अध्यक्ष रहे। अमरकांत और प्रो.ओपी मालवीय के दोस्त रहे प्रो.अकील का उर्दू के साथ ही हिन्दी से भी गहरा नाता रहा। हालांकि जब तक वह सक्रिय रहे, आयोजनों में पूरी शिद्तत से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे।
अच्छे नक्काद ही नहीं कामयाब उस्ताद भी
प्रो.अकील रिजवी प्रगतिशील आंदोलन के अग्रणी थे। प्रगतिशील लेखन में उन्होंने जबर्दस्त काम किया। इसे आगे बढ़ाया। वह जितने अच्छे नक्काद थे, उतने ही अच्छे अध्यापक भी। उनके शागिर्दों की लंबी फेहरिस्त है। कामयाब उस्ताद की यही पहचान होती है। वह जब तक सक्रिय रहे, अदबी कार्यक्रमों में शिद्दत से शामिल होते रहे। उनका जाना बहुत दुखद है। -पद्श्री शम्सुर्रहमान फारूकी
भाषा के संस्कार पर देते थे ध्यान
प्रो.अकील रिजवी उर्दू अदब का ऐसा नाम रहा जिन्हें हिंदी के लोगों का भी बहुत स्नेह और सम्मान मिला। वह सिर्फ इलाहाबाद ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर थे। वह भाषा के बारे में बहुत सावधान रहते थे। जब भी वह यात्रा पर निकलते थे, तो भाषा के संस्कार पर बातें करते रहते थे। कौन का शब्द किस भाषा से आया, इस पर उनका बड़ा काम है। उनका जाना उर्दू अदब का बड़ा नुकसान है।वह गंगा-जमुनी तहजीब के एक बडे़ पैरोकार भी थे। आमतौर पर उर्दू में आत्मकथाएं कम लिखी गई हैं लेकिन प्रो.अकील की आत्मकथा गऊधूलि काफी चर्चित रही। हिन्दी उर्दू दोस्ती के तौर पर भी उन्हें याद किया जाएगा। -प्रो.राजेंद्र कुमार, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, इविवि.
चला गया तरक्कीपसंद तहरीक का हमसफर
प्रो.अकील रिजवी का इंतकाल एक सदमा लेकर आया है। उनके होने से हौसला बना रहता था। वह प्रलेस के सरपरस्त थे। तरक्की पसंद तहरीक में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा। उर्दू अदब खासकर उर्दू आलोचना को उन्होंने बहुत समृद्ध किया। आजादी के बाद के इलाहाबाद की तारीख में उनका खास मुकाम है। इलाहाबाद की अदबी दुनिया उनके जाने से विपन्न हुई है। बहुत दुखी और परेशान हूं। -प्रो.संतोष भदौरिया, हिंदी विभाग, इविवि