फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Private schools are not only removed from KV topper

सिर्फ निजी स्कूल ही नहीं केवी से भी निकल रहे टॉपर

Fri, 08 Apr 2016 02:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 08 Apr 2016 02:06 AM IST
विज्ञापन
Private schools are not only removed from KV topper
स्कूल
पब्लिक स्कूलों के आकर्षण में पड़कर अभिभावक बच्चों का बचपना छीनने पर आमादा हैं। स्टेटस सिंबल बने ऐसे स्कूल अभिभावकों के लिए भले ही आत्म संतुष्टि के कारक हों परंतु इन स्कूलों में बच्चों पर लादा गया किताबों का बोझ निश्चित तौर पर उन्हेें शारीरिक एवं मानसिक तौर पर कमजोर बना रहा है। हालत यह है कि केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों एवं प्रदेश सरकार के राजकीय इंटर कॉलेजों से पढ़कर निकले बच्चे इंजीनियरिंग, मेडिकल, क्लैट सहित सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में पब्लिक स्कूलों के बच्चों की अपेक्षा अधिक सफल हो रहे हैं। 
विज्ञापन


सरकारी एवं निजी स्कूलों में बच्चों की सफलता पर एनसीईआरटी और एससीईआरटी की पाठ्यक्रम समितियों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें पढ़ाई जाती हैं जो मानक के अनुसार होने के साथ बच्चों की शारीरिक क्षमता के अनुरूप भी होती हैं। इस कारण से इन किताबों को पढ़कर बच्चे अच्छी सफलता हासिल कर रहे हैं। वहीं केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों एवं अन्य सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का चयन योग्यता के आधार पर होता है जबकि पब्लिक स्कूलों में शिक्षकों का चयन प्रबंधन से अपनी पहुंच के जरिए होता है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार केंद्रीय विद्यालयों के साथ उनके स्तर के नए स्कूल खोले।
विज्ञापन


सीबीएसई की ओर से होने वाली 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा के कई वर्षों के रिजल्ट बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष परीक्षा में सरकारी स्कूलों केंद्रीय विद्यालय, नवोदय के छात्र निजी स्कूलों के छात्रों के मुकाबले काफी आगे रहे हैं। सीबीएसई की ओर से 10वीं के इलाहाबाद रीजन के रिजल्ट में 81 नवोदय विद्यालयों का परिणाम 99.55 फीसदी, 134 केंद्रीय विद्यालयों का 99.65 एवं 1605 पब्लिक स्कूलों का परिणाम 99.28 फीसदी रहा। इलाहाबाद स्थित नौ केंद्रीय विद्यालयों एवं एक जवाहर नवोदय विद्यालय का परिणाम भी पब्लिक स्कूलों पर भारी पड़ा। नवोदय एवं केंद्रीय विद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए आयोग गठित है, जो पूरे मानक का पालन करने हुए चयन करता है, जबकि निजी स्कूलों के प्रबंधन बिना किसी मानक के शिक्षकों का चयन करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में एनसीईआरटी की किताबें ही लागू हैं। इसके पैटर्न पर ही जेईई, एआईपीएमटी, सहित देश में होने वाली अन्य इंजीनियरिंग एवं मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं होती हैं। एनसीईआरटी की किताबों को पढ़कर बच्चे जब बड़ी सफलता हासिल कर रहे हैं तो अन्य बच्चाें पर किताबों का बोझ लादना उचित नहीं है। निजी स्कूलों में एक किताब के बदले दो से तीन किताबें बच्चों पर थोपी जाती हैं। सरकार को चाहिए कि वह केंद्रीय विद्यालयों के साथ उनके स्तर के नए विद्यालय खोले जिससे अभिभावकों के सामने नए विकल्प उपलब्ध हों। इनमें अधिक से अधिक बच्चों के प्रवेश की व्यवस्था होनी चाहिए।
- राज सिंह, केंद्रीय पाठ्यक्रम मामलों के विशेषज्ञ

सरकार को सरकारी एवं निजी स्कूलों में सख्ती से एक ही किताब की व्यवस्था लागू करनी चाहिए। इसके लिए सरकार निजी प्रकाशकों पर रोक लगाए। एनसीईआरटी की किताबों की जगह निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लागू करने वाले स्कूल तर्क देते हैं कि उनकी किताबों में अधिक तथ्य रोचक तरीके से मौजूद हैं। निजी प्रकाशक किताबों को आकर्षित बनाकर बच्चों को गुमराह करते हैं। जब एक समान किताबें सरकारी एवं निजी स्कूलों में लागू होंगी तो अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहेंगे।
-प्रभाकर त्रिपाठी, प्रादेशिक पाठ्यक्रम मामलों के जानकार

केंद्रीय विद्यालय में बच्चों को योग्य शिक्षकों एवं मानक पुस्तकों से पढ़ाया जाता है। यहां पढ़ाई जाने वाली किताबें स्तरीय होती हैं। बाहरी चकाचौंध से दूर बच्चे अच्छी शिक्षा पाते हैं। इन स्कूलों का परिणाम लगातार अच्छा आ रहा है। यहां से इंजीनियरिंग एवं मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के टॉपर निकल रहे हैं। इस कारण से सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

- अशोक तिवारी, केंद्रीय विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावक

शहर के नामी पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाना स्टेट्स सिंबल बन गया है।  स्टेट्स सिंबल बने ऐसे विद्यालय अपने बाहरी आडंबर से बच्चों एवं अभिभावकों को अपनी ओर खींच रहे हैं। केन्द्रीय एवं नवोदय विद्यालयों में प्रवेश में परेशानी भी निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की वजह है। यदि इन केंद्रीय विद्यालयों में प्रवेश हो तो फिर अधिक फीस में बच्चों को निजी स्कूलों में क्यों भेजें।
- जितेंद्र सिंह, निजी स्कूल में बच्चे को पढ़ाने वाले अभिभावक
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed