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प्राण प्रतिष्ठा, चक्षुदान से जाग्रत हुईं प्रतिमाएं
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Prayagraj Navraatra
- फोटो : CITY DESK
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पंडालों में महिलाओं की टोली ने सुनाए भजन, भोग, भंडारा
प्रयागराज। दुर्गोत्सव के तहत शनिवार को दुर्गा पूजा पंडालों में देवी की महासप्तमी की विशिष्ट पूजा-आराधना की गई। बांग्ला परंपरा के अनुसार नवदुर्गा की प्रतीक कलाबहू और नवपत्रिका का पूजन किया गया। केला सहित धान, कोचू मान, अशोक, अनार, हल्दी, अपराजिता, बेल, जयंती की डालियां और पत्ते को शामिल करके हुए कलाबहू तैयार की गई। फिर जोड़ा बेल लगाकर केले को पौधे को नारी का रूप दिया गया। भोर में ‘कलाबहू’ को स्नान कराने के बाद कपड़े पहनाए गए।
ढाक की थाप पर पुरोहितों की देखरेख में पूजा-अर्चना और ‘उषा आरती’ के बाद प्राण प्रतिष्ठा और चक्षुदान हुआ। नवपत्रिका पूजन करके जीव प्रतीक कलाबहू को घट में आमंत्रित किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दर्पण में मां के बिंब को स्नान कराके बीजमंत्र लिखा गया। फिर घट से देवी के हृदय में प्राणप्रतिष्ठा की गई। इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से देवी की आंखों पर बांधी गई पट्टी खोलकर चक्षुदान कराया गया। प्राणप्रतिष्ठा और चक्षुदान के साथ ही देवी प्रतिमाएं जाग्रत हुईं।
महासप्तमी की पूजा के बाद तो पंडालों में और रौनक आ गई। पूजा के बाद बारबारियों और मोहल्ले के श्रद्धालुओं की ओर से भी भोग चढ़ाया गया। महासप्तमी के पूजन से लेकर पुष्पांजलि, भोग, भंडारा में श्रद्धालुओं में जबर्दस्त उत्साह दिखा। बारवारियों की ओर से अनेक सांगीतिक कार्यक्रम भी हुए। बारवारियों के भीतर और बाहर मेले जैसा माहौल रहा। लोग पूरे परिवार के साथ पंडाल और प्रतिमाओं को देखने केलिए एक बारवारी से दूसरी बारवारी में जाते रहे। अनुष्ठान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लोगों की आवाजाही से आधी रात के बाद तक चहल-पहल बनी रही।
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प्रयागराज। दुर्गोत्सव के तहत शनिवार को दुर्गा पूजा पंडालों में देवी की महासप्तमी की विशिष्ट पूजा-आराधना की गई। बांग्ला परंपरा के अनुसार नवदुर्गा की प्रतीक कलाबहू और नवपत्रिका का पूजन किया गया। केला सहित धान, कोचू मान, अशोक, अनार, हल्दी, अपराजिता, बेल, जयंती की डालियां और पत्ते को शामिल करके हुए कलाबहू तैयार की गई। फिर जोड़ा बेल लगाकर केले को पौधे को नारी का रूप दिया गया। भोर में ‘कलाबहू’ को स्नान कराने के बाद कपड़े पहनाए गए।
ढाक की थाप पर पुरोहितों की देखरेख में पूजा-अर्चना और ‘उषा आरती’ के बाद प्राण प्रतिष्ठा और चक्षुदान हुआ। नवपत्रिका पूजन करके जीव प्रतीक कलाबहू को घट में आमंत्रित किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दर्पण में मां के बिंब को स्नान कराके बीजमंत्र लिखा गया। फिर घट से देवी के हृदय में प्राणप्रतिष्ठा की गई। इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से देवी की आंखों पर बांधी गई पट्टी खोलकर चक्षुदान कराया गया। प्राणप्रतिष्ठा और चक्षुदान के साथ ही देवी प्रतिमाएं जाग्रत हुईं।
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महासप्तमी की पूजा के बाद तो पंडालों में और रौनक आ गई। पूजा के बाद बारबारियों और मोहल्ले के श्रद्धालुओं की ओर से भी भोग चढ़ाया गया। महासप्तमी के पूजन से लेकर पुष्पांजलि, भोग, भंडारा में श्रद्धालुओं में जबर्दस्त उत्साह दिखा। बारवारियों की ओर से अनेक सांगीतिक कार्यक्रम भी हुए। बारवारियों के भीतर और बाहर मेले जैसा माहौल रहा। लोग पूरे परिवार के साथ पंडाल और प्रतिमाओं को देखने केलिए एक बारवारी से दूसरी बारवारी में जाते रहे। अनुष्ठान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लोगों की आवाजाही से आधी रात के बाद तक चहल-पहल बनी रही।
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