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शिक्षा अधिकरण पर पीआईएल सुनवाई के लिए स्वीकार
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शिक्षा सेवा अधिकरण पर जनहित याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा सेवा अधिकरण सहित प्रदेश के सभी अधिकरणों की पीठ हाईकोर्ट की प्रधानपीठ के स्थान प्रयागराज में स्थापित करने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में 16 सितंबर तक जवाब मांगा है। याचीपक्ष से भी अपना प्रत्युत्तर 20 सितंबर तक दाखिल करने को कहा है। याचिका की फाइनल सुनवाई की तिथि 23 सितंबर को तय की है।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर तथा न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की खंडपीठ ने अधिवक्ता प्रभाशंकर मिश्र की जनहित याचिका पर दिया है। बार के पदाधिकारी सोमवार सुबह दस बजे बहस के लिए मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में पहुंचे। मुख्य न्यायाधीश ने जानना चाहा कि क्या वकीलों ने कार्य बहिष्कार वापस ले लिया है। कोर्ट ने बार से कहा कि न्यायिक कार्य पर वापस लौटेंगे तभी याचिका पर सुनवाई होगी। न्यायिक कार्य बहिष्कार और बहस दोनों साथ नहीं हो सकती। वादकारियों को भी अपने मुकदमे की सुनवाई का अधिकार है।
इसके बाद एक बजे दोपहर बार की आम सभा बुलाई गई और न्यायिक कार्य बहिष्कार निलंबित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। कोर्ट को बार के प्रस्ताव की जानकारी वरिष्ठ अधिवक्ता वीसी मिश्र ने दी। महासचिव जेबी सिंह ने भी कोर्ट को बताया कि न्यायिक कार्य बहिष्कार का प्रस्ताव स्थगित कर दिया गया है। इसके बाद याचिका की सुनवाई शुरू हुई। कोर्ट ने राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता अजीत कुमार सिंह व अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता सुधांशु श्रीवास्तव को याचिका पर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। भारत सरकार की तरफ से सहायक सॉलिसिटर जनरल ज्ञान प्रकाश और भारत सरकार के अधिवक्ता राजेश त्रिपाठी मौजूद थे।
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याचिका में अधिकरण गठित करने की राज्य सरकार की नीति बताने की भी मांग की गई है और कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में साफ कहा गया है कि जहां हाईकोर्ट की पीठ हो, न्यायिक अधीक्षण के लिए उसी स्थान पर अधिकरण होना चाहिए। कोर्ट के स्थापित विधि सिद्धांतों के विपरीत राज्य सरकार लखनऊ में अधिकरण स्थापित कर रही है।
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा सेवा अधिकरण सहित प्रदेश के सभी अधिकरणों की पीठ हाईकोर्ट की प्रधानपीठ के स्थान प्रयागराज में स्थापित करने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में 16 सितंबर तक जवाब मांगा है। याचीपक्ष से भी अपना प्रत्युत्तर 20 सितंबर तक दाखिल करने को कहा है। याचिका की फाइनल सुनवाई की तिथि 23 सितंबर को तय की है।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर तथा न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की खंडपीठ ने अधिवक्ता प्रभाशंकर मिश्र की जनहित याचिका पर दिया है। बार के पदाधिकारी सोमवार सुबह दस बजे बहस के लिए मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में पहुंचे। मुख्य न्यायाधीश ने जानना चाहा कि क्या वकीलों ने कार्य बहिष्कार वापस ले लिया है। कोर्ट ने बार से कहा कि न्यायिक कार्य पर वापस लौटेंगे तभी याचिका पर सुनवाई होगी। न्यायिक कार्य बहिष्कार और बहस दोनों साथ नहीं हो सकती। वादकारियों को भी अपने मुकदमे की सुनवाई का अधिकार है।
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इसके बाद एक बजे दोपहर बार की आम सभा बुलाई गई और न्यायिक कार्य बहिष्कार निलंबित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। कोर्ट को बार के प्रस्ताव की जानकारी वरिष्ठ अधिवक्ता वीसी मिश्र ने दी। महासचिव जेबी सिंह ने भी कोर्ट को बताया कि न्यायिक कार्य बहिष्कार का प्रस्ताव स्थगित कर दिया गया है। इसके बाद याचिका की सुनवाई शुरू हुई। कोर्ट ने राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता अजीत कुमार सिंह व अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता सुधांशु श्रीवास्तव को याचिका पर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। भारत सरकार की तरफ से सहायक सॉलिसिटर जनरल ज्ञान प्रकाश और भारत सरकार के अधिवक्ता राजेश त्रिपाठी मौजूद थे।
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याचिका में अधिकरण गठित करने की राज्य सरकार की नीति बताने की भी मांग की गई है और कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में साफ कहा गया है कि जहां हाईकोर्ट की पीठ हो, न्यायिक अधीक्षण के लिए उसी स्थान पर अधिकरण होना चाहिए। कोर्ट के स्थापित विधि सिद्धांतों के विपरीत राज्य सरकार लखनऊ में अधिकरण स्थापित कर रही है।