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सिंदूरी आभा से दमक उठे व्रती चेहरे
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 07 Nov 2016 02:35 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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डाला छठ के तीसरे दिन रविवार को अस्ताचलगामी यानी डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया गया। नाक से माथे तक का मंगल सिंदूर लगाए दुल्हन जैसा शृंगार कर व्रती महिलाओं ने कमर भर पानी में खड़े होकर जब अर्घ्य दिया तो सिंदूरी आभा से उनके चेहरे दमक उठे। जब तक सूर्य अस्त नहीं हुआ तब तक तट पर घंटा घड़ियाल शंख ध्वनि के साथ भगवान सूर्य देव की जय के घोष से संगम समेत गंगा यमुना के तट गूंजते रहे।
खरना की शाम से शुरू हुआ निर्जला व्रत सूर्यषष्ठी डाला छठ के दिन भी जारी रहा। व्रती महिलाओं का पूरा दिन तैयारी में बीता। शुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया। कलात्मक तरीके से सजाए गए डाला में गन्ना, सिंघाड़ा, आंवला, अन्नास, कैथा, चकोतरा, नारियल, मीठा नीबू, नीबू, अनार, संतरा, अमरूद, केला, सेब, हरी हल्दी, हरी अदरक, इमली, अमरा, बेर, सुतनी, मूली, कदम का फूल, शकरकंद, करौंदा, अमरख, छोटी, बड़ी नारंगी, मूली, अरवी, बंडा, मीठी नीम मकोय आदि बावन प्रकार की सामग्री सजाई गई।
डाला में कच्चे सूत की माला, करधनी आदि भी रखी गई। सजे सूप के अगले भाग में जलता हुआ मिट्टी का दिया रखा गया पीले कपड़े पहनकर व्रती महिलाओं ने घर से घाट तक का सफर तय किया। वहीं जिनकी मनौती पूरी हुई थीं उन्होंने घर से घाट तक की रास्ता लेट कर पूरा किया। घाट पर बनी वेदी पर विधिविधान से पूजा और ‘अभी न डुबिहे भास्कर दीनानाथ करिहे घरवा उजार हो’ सूर्य देव से जल्दी न डूबने की प्रार्थना की गई। जैसे-जैसे सूर्य अस्त होने लगा अर्घ्य देकर परिवार एवं संतान के सुख सौभाग्य आयुष्य की मंगल कामना की गई।
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जलता दीपक लेकर घर पहुंचीं
व्रती महिलाओं ने घाट पर पूजा अर्चना करने के बाद सूप में जलता दीपक रखकर घर पहुंचीं। पूरे रास्ते इस बात का ख्याल रखा गया कि दीपक की लौ मध्यम न हो। दीपक को पूजा घर में रखा गया। इसी दीपक को सूप में रखकर सुबह उगते सूर्य की आरती की जाएगी।
ईख, नारियल, पत्ते वाली हल्दी, मुसम्मी, शरीफा सहित कई तरह के फल गाजर, नींबू, कद्दू, मूली, अदरक, पुआ आदि से सजे डाला को घर से घाट तक लाने का काम पति और पुत्रों ने किया। सूर्य आराधना के गीत गाती व्रती महिलाओं ने पैरों में चप्पल नहीं पहनी थी।
संगम तट पर किलाघाट से लेकर संगमनोज तक मेले का माहौल रहा। जैसे ही सूर्य अस्ताचल को जाने लगा संगम तट घंटा-घड़ियाल शंखनाद से गूंज उठा। पूर्वांचल छठ पूजा समिति की ओर से जमकर आतिशबाजी की गई। समिति के सदस्य अध्यक्ष अजय राय की अगुवाई में तट पर मुस्तैद रहे। समिति की ओर से भूले भटके शिविर लगाया गया था, जिसमें बारह बच्चों को उनके परिजनों से मिलाया गया।
बाबा समाज सेवी संस्थान की ओर से सुबह घाट की साफ सफाई की गई। बच्चों को उनके अभिभावकों तक पहुंचाने और गोताखोरों का इंतजाम किया गया था। मेले में बिछड़े तीन बच्चों को उनके अभिभावकों से मिलाया गया। अध्यक्ष सतीश केसरवानी की अगुवाई में जितेंद्र, सुधीर, मनोज, प्रतिमा, एकता, सीमा, धीरज, राजू आदि श्रद्धालुओं की मदद करते नजर आए।
संगमतट पर पूर्वांचल छठ पूजा समिति की ओर से आयोजित छठ महोत्सव के तहत भोजपुरी संध्या में गायकों ने सूर्य और छठ मइया की महिमा का गुणगान करने वाले भजन सुनाकर भावविभोर किया। गायिका शशि सिंह ने कांचे बांस की बहंगिया, बहंगी लचकत जाए और मिश्र बंधु ने ले ले अरघिया सुनाकर वाहवाही बटोरी। कार्यक्र्रम देर रात चलता रहा। सोमवार की सुबह आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ
डाला छठ व्रत की पूर्णता सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर होगी। व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले घाट पहुंच जाएंगी। विधिविधान से पूजा अर्चना, अर्घ्य देंगी और मीठा खाकर व्रत खोलेंगी।
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खरना की शाम से शुरू हुआ निर्जला व्रत सूर्यषष्ठी डाला छठ के दिन भी जारी रहा। व्रती महिलाओं का पूरा दिन तैयारी में बीता। शुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया। कलात्मक तरीके से सजाए गए डाला में गन्ना, सिंघाड़ा, आंवला, अन्नास, कैथा, चकोतरा, नारियल, मीठा नीबू, नीबू, अनार, संतरा, अमरूद, केला, सेब, हरी हल्दी, हरी अदरक, इमली, अमरा, बेर, सुतनी, मूली, कदम का फूल, शकरकंद, करौंदा, अमरख, छोटी, बड़ी नारंगी, मूली, अरवी, बंडा, मीठी नीम मकोय आदि बावन प्रकार की सामग्री सजाई गई।
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डाला में कच्चे सूत की माला, करधनी आदि भी रखी गई। सजे सूप के अगले भाग में जलता हुआ मिट्टी का दिया रखा गया पीले कपड़े पहनकर व्रती महिलाओं ने घर से घाट तक का सफर तय किया। वहीं जिनकी मनौती पूरी हुई थीं उन्होंने घर से घाट तक की रास्ता लेट कर पूरा किया। घाट पर बनी वेदी पर विधिविधान से पूजा और ‘अभी न डुबिहे भास्कर दीनानाथ करिहे घरवा उजार हो’ सूर्य देव से जल्दी न डूबने की प्रार्थना की गई। जैसे-जैसे सूर्य अस्त होने लगा अर्घ्य देकर परिवार एवं संतान के सुख सौभाग्य आयुष्य की मंगल कामना की गई।
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जलता दीपक लेकर घर पहुंचीं
व्रती महिलाओं ने घाट पर पूजा अर्चना करने के बाद सूप में जलता दीपक रखकर घर पहुंचीं। पूरे रास्ते इस बात का ख्याल रखा गया कि दीपक की लौ मध्यम न हो। दीपक को पूजा घर में रखा गया। इसी दीपक को सूप में रखकर सुबह उगते सूर्य की आरती की जाएगी।
ईख, नारियल, पत्ते वाली हल्दी, मुसम्मी, शरीफा सहित कई तरह के फल गाजर, नींबू, कद्दू, मूली, अदरक, पुआ आदि से सजे डाला को घर से घाट तक लाने का काम पति और पुत्रों ने किया। सूर्य आराधना के गीत गाती व्रती महिलाओं ने पैरों में चप्पल नहीं पहनी थी।
संगम तट पर किलाघाट से लेकर संगमनोज तक मेले का माहौल रहा। जैसे ही सूर्य अस्ताचल को जाने लगा संगम तट घंटा-घड़ियाल शंखनाद से गूंज उठा। पूर्वांचल छठ पूजा समिति की ओर से जमकर आतिशबाजी की गई। समिति के सदस्य अध्यक्ष अजय राय की अगुवाई में तट पर मुस्तैद रहे। समिति की ओर से भूले भटके शिविर लगाया गया था, जिसमें बारह बच्चों को उनके परिजनों से मिलाया गया।
बाबा समाज सेवी संस्थान की ओर से सुबह घाट की साफ सफाई की गई। बच्चों को उनके अभिभावकों तक पहुंचाने और गोताखोरों का इंतजाम किया गया था। मेले में बिछड़े तीन बच्चों को उनके अभिभावकों से मिलाया गया। अध्यक्ष सतीश केसरवानी की अगुवाई में जितेंद्र, सुधीर, मनोज, प्रतिमा, एकता, सीमा, धीरज, राजू आदि श्रद्धालुओं की मदद करते नजर आए।
संगमतट पर पूर्वांचल छठ पूजा समिति की ओर से आयोजित छठ महोत्सव के तहत भोजपुरी संध्या में गायकों ने सूर्य और छठ मइया की महिमा का गुणगान करने वाले भजन सुनाकर भावविभोर किया। गायिका शशि सिंह ने कांचे बांस की बहंगिया, बहंगी लचकत जाए और मिश्र बंधु ने ले ले अरघिया सुनाकर वाहवाही बटोरी। कार्यक्र्रम देर रात चलता रहा। सोमवार की सुबह आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ
डाला छठ व्रत की पूर्णता सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर होगी। व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले घाट पहुंच जाएंगी। विधिविधान से पूजा अर्चना, अर्घ्य देंगी और मीठा खाकर व्रत खोलेंगी।