फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Penalties for murder is not necessary with penalty

हत्या के जुर्म में सजा के साथ आवश्यक नहीं है जुर्माना

Sun, 26 Mar 2017 01:34 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 26 Mar 2017 01:34 AM IST
विज्ञापन
Penalties for murder is not necessary with penalty
मुकदमा - फोटो : demo pic
हाईकोर्ट की तीन जजों की पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह निर्धारित किया है कि हत्या के अपराध में सजा के साथ अर्थदंड लगाना अनिवार्य नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 302 में हत्या के अपराध के लिए मृत्यु दंड या आजीवन कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है। इसकी व्याख्या इस प्रकार से नहीं की जा सकती है कि सजा और जुर्माना दोनों जरूरी है।
विज्ञापन


हत्या के लिए सजा के इस प्रावधान पर हाईकोर्ट की दो खंडपीठों के  आदेशों में मतभिन्नता को देखते हुए हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने इस विधिक प्रश्न का समाधान करने हेतु मुख्य न्यायमूर्ति को प्रकरण रेफर किया था। मुख्य न्यायमूर्ति डीबी भोसले, न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पूर्णपीठ बनाई गई।
विज्ञापन


हाईकोर्ट की खंडपीठों के निर्णयों पर विचार के बाद पूर्णपीठ ने कहा कि ‘अदालतों को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अभियुक्त को सजा सुनाने के अलावा जुर्माना भी लगा सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत को हर मामले में एक नियम की तरह जुर्माना लगाना चाहिए। हालांकि अदालतों से यह अपेक्षित है कि मामले के तथ्य और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जुर्माना लगाएं और पीड़ित को मुआवजा भी दिलवाएं। पीठ ने कहा कि धारा 302 या अन्य समान धाराओं में जुर्माने की कोई उच्चतम सीमा तय नहीं की गई है। आईपीसी की धारा 63 कहती है कि जुर्माने की कोई उच्चतम सीमा तय नहीं है इसलिए यह असीमित हो सकती है लेकिन यह न तो अत्याधिक होनी चाहिए और न ही बहुत कम। जुर्माने का निर्धारण करते समय अभियुक्त की आर्थिक स्थिति, अपराध की गंभीरता, अभियुक्त से पीड़ित को हुए नुकसान की मात्रा आदि पर विचार किया जाना चाहिए। हर केस के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार कर निर्णय लेना चाहिए कि जुर्माना लगाने की आवश्यकता है अथवा नहीं। यह प्रक्रिया यांत्रिक नहीं होनी चाहिए। न्यायालय को विचार करना चाहिए कि पीड़ित को मुआवजा दिलाने की आवश्यकता है अथवा नहीं।’
विज्ञापन
विज्ञापन


उल्लेखनीय है कि सुखदेव बनाम राज्य सरकार की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते समय हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा था कि यह देखने में आ रही है कि हत्या जैसे गंभीर अपराधों में निचली अदालतें मात्र सजा का आदेश दे रही हैं जुर्माना नहीं लगा रही हैं। पीठ का मत था कि धारा 302 के तहत सजा के साथ जुर्माना भी जरूरी है। खंडपीठ ने महानिबंधक को आदेश दिया था कि उनके फैसले की प्रति जेटीआरआई (ज्यूडिशियल टेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट) को भी भेजने का निर्देश दिया था ताकि न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देने में मदद मिले। इस आदेश पर हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने विचार किया तो पता चला कि संतोष कुमार बर्नवाल केस में एक अन्य खंडपीठ ने कहा कि सजा के साथ जुर्माना लगाना अनिवार्य नहीं है और यह संबंधित न्यायालय पर निर्भर करता है। इस मतभिन्नता को देखते हुए प्रकरण पूर्णपीठ को संदर्भित किया गया था।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed