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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Painkillers that poison the water of rivers and ponds will be purified with water chestnuts.

Research : नदियों-तालाबों के पानी को जहर बनातीं दर्द निवारक दवाओं का सिंघाड़े से होगा शोधन

Fri, 20 Sep 2024 03:16 PM IST
विनोद सिंह अमित सरन, अमर उजाला प्रयागराज
अमित सरन, अमर उजाला प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 20 Sep 2024 03:16 PM IST
सार

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में पर्यावरण अध्ययन केंद्र के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुरनजीत प्रसाद के मुताबिक इंसानों में ही नहीं, पशुओं को भी दर्द निवारक के रूप में डाइक्लोफेनेक दवा दी जाती है। यह दवा शरीर से निकले अपशिष्ट के साथ नदियों-तालाबों तक पहुंच कर वहां के पानी में मौजूद शैवालों (एल्गी) में प्रकाश संश्लेषण को बाधित कर रही है। इससे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है।

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Painkillers that poison the water of rivers and ponds will be purified with water chestnuts.
सिंघाड़ा। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इंसानों और पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवाओं (डाइक्लोफेनेक) से नदियों और तालाबों के पानी में घट रही ऑक्सीजन का इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने निदान खोज निकाला है। इनका सिंघाड़े के छिलके और मॉडीफाइड आयरन से तैयार जल शोधक डाइक्लोफेनेक के घातक असर को 97 फीसदी तक घटा सकता है। यह शोध पत्र जर्मनी के एनवायरमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च ने भी प्रकाशित किया है।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में पर्यावरण अध्ययन केंद्र के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुरनजीत प्रसाद के मुताबिक इंसानों में ही नहीं, पशुओं को भी दर्द निवारक के रूप में डाइक्लोफेनेक दवा दी जाती है। यह दवा शरीर से निकले अपशिष्ट के साथ नदियों-तालाबों तक पहुंच कर वहां के पानी में मौजूद शैवालों (एल्गी) में प्रकाश संश्लेषण को बाधित कर रही है। इससे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है। इसका समाधान तलाशने के लिए प्रो. सुरनजीत प्रसाद के निर्देशन में उनकी शोधार्थी अमरीन बानो ने काम शुरू किया।

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प्रो. सुरनजीत बताते हैं कि डाइक्लोफेनेक दवा दर्द दूर करती है, लेकिन मरीज की रोगों से लड़ने की क्षमता में भी कमी लाती है। शरीर से अपशिष्ट के साथ निकली यह दवा नालों के जरिये नदियों और तालाबों तक पहुंच रही है। इसे भूजल में भी पाया जा चुका है। डाइक्लोफेनेक का घातक असर कृषि उत्पादन, वनस्पतियाें और मछलियों तमाम जलीय जीव-जंतुओं पर भी देखने को मिला है। इससे पूरा इको सिस्टम छिन्न-भिन्न होता जा रहा है।

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जल शोधक ने खत्म किया घातक असर

प्रो. सुरनजीत के मुताबिक नदियों और तालाबों के पानी की जांच में केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी), अमोनिया, नाइट्रेट, फॉस्फेट, डाइक्लोफेनेक जैसे तत्व अलग-अलग मात्रा में मिले। इस पानी को सिंघाड़े के छिलके और मॉडीफाइड आयरन से तैयार जल शोधक का इस्तेमाल करके दोबारा परखा गया। इसमें सीओडी की मात्रा 92.50 फीसदी, अमोनिया की 86.41, नाइट्रेट की 77.51, फॉस्फेट की 84.54 और डाइक्लोफेनेक की मात्रा 97.5 फीसदी तक कम पाई गई।

गिद्धों के लुप्त होने की बड़ी वजह डाइक्लोफेनेक
 

गिद्ध के लुप्त होने के पीछे भी वैज्ञानिक डाइक्लोफेनेक को ही जिम्मेदार मानते हैं। डाइक्लोफेनेक एक नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग है, जो हल्के या मध्यम दर्द के इलाज में दी जाती है। यह जोड़ों के दर्द, सूजन अथवा गठिया पीड़ित मरीजों को काफी राहत देती है। प्रो. सुरनजीत के अनुसार पशुओं को दर्द निवारक दवाओं की काफी अधिक डोज दी जाती है। ऐसे बीमार पशुओं की 15-20 दिन के अंदर मौत होने पर अगर गिद्ध उसका मांस खा लेते हैं तो उनकी भी जान चली जाती है। कारण यह कि डाइक्लोफेनेक का हल्का डोज भी गिद्धों के लिए जहर सरीखा है।
 

अगले चरण में होगा नुकसान का आकलन
 

इविवि के वैज्ञानिकों के शोध में यह तो पता चल गया कि डाइक्लोफेनेक जैसी दर्द निवारक दवाएं पूरे इको सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित कर रहीं हैं, लेकिन यह किस जीव को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं, इसकी जानकारी शोध के अगले चरण में की जाएगी।

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