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Prayagraj News: समय का हस्ताक्षर खुद बनना पड़ता है...इस सलाह ने बदल दी वकालत की दिशा
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कानून के पुरोधा में वरिष्ठ अधिवक्ता आरती राजे से बातचीत
इलाहाबाद हाईकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता आरती राजे ने अपनी 34 साल की न्यायिक यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने वकालत के शुरुआती दिनों का रोचक प्रसंग सुनाया। कहा कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने मुझसे कहा था कि समय का हस्ताक्षर खुद बनना पड़ता है। सीनियर के भरोसे कब तक वकालत करेंगी। इस सलाह ने मेरे पेशेवर जीवन की दिशा बदल दी।
आरती ने बताया कि वह एक याचिका पर बहस कर रही थीं। उन्हें उम्मीद थी कि फैसला उनके पक्ष में आएगा। हालांकि, जज साहब ने उस दिन अंतिम आदेश पारित नहीं किया और अगली तारीख लगा दी। इस बीच उनके मुवक्किल ने कहा कि शायद वह जूनियर हैं। इसलिए अदालत ने उनकी दलील गंभीरता से नहीं सुनी। ऐसे में वरिष्ठ अधिवक्ता को शामिल करने की बात कही।
उन्होंने यह बात एक वरिष्ठ अधिवक्ता को बात बताई। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने उनसे कहा कि समय का हस्ताक्षर खुद बनना पड़ता है। तथ्यों और कानून पर आपकी पकड़ मजबूत है। ऐसे में आपको ही अपना पक्ष रखना चाहिए। आरती ने बताया कि इस प्रेरणा के बाद वह अगले दिन पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी दलीलें रखीं और पक्ष में फैसला आया।
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उन्होंने अपना एक और अनुभव साझा किया। बताया कि एक बार वह महिला अधिवक्ताओं के साथ कोर्ट में खड़ी थीं। इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या यही संस्कार हैं कि महिलाएं खड़ी रहें और पुरुष बैठे रहें। इसके बाद तुरंत जूनियर अधिवक्ताओं ने सीट खाली कर दीं। यह घटना दर्शाती है कि कोर्ट कानून के साथ गरिमा, सम्मान और संस्कार को भी महत्व देता है।
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आरती ने बताया कि वह एक याचिका पर बहस कर रही थीं। उन्हें उम्मीद थी कि फैसला उनके पक्ष में आएगा। हालांकि, जज साहब ने उस दिन अंतिम आदेश पारित नहीं किया और अगली तारीख लगा दी। इस बीच उनके मुवक्किल ने कहा कि शायद वह जूनियर हैं। इसलिए अदालत ने उनकी दलील गंभीरता से नहीं सुनी। ऐसे में वरिष्ठ अधिवक्ता को शामिल करने की बात कही।
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उन्होंने यह बात एक वरिष्ठ अधिवक्ता को बात बताई। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने उनसे कहा कि समय का हस्ताक्षर खुद बनना पड़ता है। तथ्यों और कानून पर आपकी पकड़ मजबूत है। ऐसे में आपको ही अपना पक्ष रखना चाहिए। आरती ने बताया कि इस प्रेरणा के बाद वह अगले दिन पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी दलीलें रखीं और पक्ष में फैसला आया।
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उन्होंने अपना एक और अनुभव साझा किया। बताया कि एक बार वह महिला अधिवक्ताओं के साथ कोर्ट में खड़ी थीं। इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या यही संस्कार हैं कि महिलाएं खड़ी रहें और पुरुष बैठे रहें। इसके बाद तुरंत जूनियर अधिवक्ताओं ने सीट खाली कर दीं। यह घटना दर्शाती है कि कोर्ट कानून के साथ गरिमा, सम्मान और संस्कार को भी महत्व देता है।