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गौरव गाथा: 1971 के युद्ध में नब्बे हजार पाक सैनिकों को करना पड़ा था आत्मसमर्पण
Fri, 01 Mar 2019 04:25 PM IST
देव कश्यप
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: देव कश्यप
Updated Fri, 01 Mar 2019 04:25 PM IST
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भारत की ओर से पाकिस्तान की सीमा में घुसकर किए गए जवाबी हमले को लेकर सभी उत्साहित हैं। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में पठानकोट में मोर्चे पर डटे रहे कर्नल एसआर दुबे भी मौजूदा कार्रवाई से गौरवान्वित हैं। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने सिलसिलेवार तरीके से उस दौर की गौरव गाथा बयां की।
हम आगे बढ़कर पार सैनिकों को मारते रहे। उनके कैदी, उनकी जमीन लेते रहे। हालाकि, कब्जे में ली गई पाक की जमीन को बाद मे छोड़ भी दिया। इससे 'हाजी पीर' को छोड़ना बड़ी भूल रही, क्योंकि उसी ओर से पाक की घुसपैठ जारी रही, क्योंकि उसी ओर से पार की घुसपैठ जारी रही। यह लड़ाई भले ही दिसंबर 1971 में शुरू हुई, लेकिन इसकी भूमिका दिसंबर 1970 में बन गयी थी, जब हमारी एक टुकड़ी को लाहौर से जाकर जला दिया गया था। उसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था कि युद्ध होकर रहेगा।
तब भारत के आर्मी चीफ जनरल मानेक शॉ थे। उन्होने अपने सैनिकों के बीच उसी समय युद्ध की घोषणा कर दी थी, बस इसकी तारीख तय नही थी। भारत के एक-एक सैनिकों को पता था कि युद्ध होना तय है बस इसकी औपचारिक घोषणा होनी बाकी है। वैसे भी भारत का उद्देश्य भआ कि हम हमलावर न कहे जाएं। तीन दिसंबर 1971 को चारों ही ऐर से एक साथ युद्ध आरंभ हुआ। तब मै पठानकोट में था। शाम को तकरीबन 6 बजे पार के चार जेट पठानकोट से होकर गुजरे, जिसके जवाब में भारतीय सेना नें फायर करके उन्हें 'इंगेज' करते हुए खदेड़ दिया। पाक जहाजों ने गोला बारूद ले जाकर नाले में गिरा दिया।
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सीज फायर की अपील होती रही लेकिन, हमारे आर्मी चीफ ने कहा, जब तक ढाका सरेंडर नही होगा हम मानेंगे नहीं। अंततः जब ढाका सरेंडर हुआ तब सीज फायर हुआ। जनरल मानेक शॉ नें पाक सैनिकों को ललकारा, चारों से घेर लिए गए हो, अगर आत्मसमर्पण नहीं किया तो मारे जाओगे। अंततः ईस्ट पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) में नब्बे हजार से ज्यादा पाक सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए विवश होना पड़ा। इस बीच रात-दिन हमारी गाड़ियां मुस्तैद रहीं जब तक सीजफायर नहीं हो गया।
विमान की सुरक्षा में आई सियालदह
तीन दिसंबर को 1971 को युद्ध आरंभ होने के साथ ही स्थानीय निवासियों ने तकरीबन पठानकोट खाली कर दिया था। मेरा परिवार पांच दिसंबर को सियालदह एक्यप्रेस से वहां से रवाना हुआ था। तब ट्रेन की सुरक्षा में चार विमानें को लगाया गया था। युद्ध आरंभ होने के बाद यह पठानकोट से चलने वाली अंतिम गाड़ी थी। घरों के बाहर बंकर बने हुए थे। पठानकोट छोड़ने से पहले छोटे से बच्चे को लेकर मेरी पत्नी सहित कई अन्य परिवार पूरे समय तक फसी पनाह लिए हुए थे।
रेड ईगल की बैरकों में रहे तकरीबन तीन हजार बंदी
भारत-पाक युद्ध में हमारे प्रयागराज के रेड ईगल की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही। यहीं के ज्यादातर सैंनिक उसमें शमिल थे। युद्ध विराम के बाद प्रयागराज में ही तकरीबन तीन हजार पार सैनियों को बंदी बनाकर रखा गया था। इसी रेड ईगल एरिया में ही उनके लिए अलग से बैरक बनी थी। हालंकि उनसे पीटी परेड नही कराते थे। वैसे हमने पाक बंदियों के साथ कोई अमानवीय बर्ताव नही किया बल्कि सरकार की ओर से उन्हें 'मेंटेनेंस एलाउंस' के साथ ही मेडिकल सुविधा भी मिलती थी।
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हम आगे बढ़कर पार सैनिकों को मारते रहे। उनके कैदी, उनकी जमीन लेते रहे। हालाकि, कब्जे में ली गई पाक की जमीन को बाद मे छोड़ भी दिया। इससे 'हाजी पीर' को छोड़ना बड़ी भूल रही, क्योंकि उसी ओर से पाक की घुसपैठ जारी रही, क्योंकि उसी ओर से पार की घुसपैठ जारी रही। यह लड़ाई भले ही दिसंबर 1971 में शुरू हुई, लेकिन इसकी भूमिका दिसंबर 1970 में बन गयी थी, जब हमारी एक टुकड़ी को लाहौर से जाकर जला दिया गया था। उसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था कि युद्ध होकर रहेगा।
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तब भारत के आर्मी चीफ जनरल मानेक शॉ थे। उन्होने अपने सैनिकों के बीच उसी समय युद्ध की घोषणा कर दी थी, बस इसकी तारीख तय नही थी। भारत के एक-एक सैनिकों को पता था कि युद्ध होना तय है बस इसकी औपचारिक घोषणा होनी बाकी है। वैसे भी भारत का उद्देश्य भआ कि हम हमलावर न कहे जाएं। तीन दिसंबर 1971 को चारों ही ऐर से एक साथ युद्ध आरंभ हुआ। तब मै पठानकोट में था। शाम को तकरीबन 6 बजे पार के चार जेट पठानकोट से होकर गुजरे, जिसके जवाब में भारतीय सेना नें फायर करके उन्हें 'इंगेज' करते हुए खदेड़ दिया। पाक जहाजों ने गोला बारूद ले जाकर नाले में गिरा दिया।
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सीज फायर की अपील होती रही लेकिन, हमारे आर्मी चीफ ने कहा, जब तक ढाका सरेंडर नही होगा हम मानेंगे नहीं। अंततः जब ढाका सरेंडर हुआ तब सीज फायर हुआ। जनरल मानेक शॉ नें पाक सैनिकों को ललकारा, चारों से घेर लिए गए हो, अगर आत्मसमर्पण नहीं किया तो मारे जाओगे। अंततः ईस्ट पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) में नब्बे हजार से ज्यादा पाक सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए विवश होना पड़ा। इस बीच रात-दिन हमारी गाड़ियां मुस्तैद रहीं जब तक सीजफायर नहीं हो गया।
विमान की सुरक्षा में आई सियालदह
तीन दिसंबर को 1971 को युद्ध आरंभ होने के साथ ही स्थानीय निवासियों ने तकरीबन पठानकोट खाली कर दिया था। मेरा परिवार पांच दिसंबर को सियालदह एक्यप्रेस से वहां से रवाना हुआ था। तब ट्रेन की सुरक्षा में चार विमानें को लगाया गया था। युद्ध आरंभ होने के बाद यह पठानकोट से चलने वाली अंतिम गाड़ी थी। घरों के बाहर बंकर बने हुए थे। पठानकोट छोड़ने से पहले छोटे से बच्चे को लेकर मेरी पत्नी सहित कई अन्य परिवार पूरे समय तक फसी पनाह लिए हुए थे।
रेड ईगल की बैरकों में रहे तकरीबन तीन हजार बंदी
भारत-पाक युद्ध में हमारे प्रयागराज के रेड ईगल की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही। यहीं के ज्यादातर सैंनिक उसमें शमिल थे। युद्ध विराम के बाद प्रयागराज में ही तकरीबन तीन हजार पार सैनियों को बंदी बनाकर रखा गया था। इसी रेड ईगल एरिया में ही उनके लिए अलग से बैरक बनी थी। हालंकि उनसे पीटी परेड नही कराते थे। वैसे हमने पाक बंदियों के साथ कोई अमानवीय बर्ताव नही किया बल्कि सरकार की ओर से उन्हें 'मेंटेनेंस एलाउंस' के साथ ही मेडिकल सुविधा भी मिलती थी।