Mahakumbh : नाजनीन अंसारी ने संगम में लगाई डुबकी, मुस्लिम देशों के लोग शांति चाहते है तो सनातन संस्कृति अपनाएं
नाज़नीन ने स्नान कर मां गंगा, मां यमुना, मां सरस्वती को पूरे श्रद्धा के साथ प्रणाम किया। कहा कि स्नान के बाद वह बहुत ही आनंदित हैं। उन्होंने कहा कि महाकुंभ में स्नान करना हमारे पूर्वजों की परंपरा और भारतीय संस्कृति है। हम किसी भी कीमत पर अरबी संस्कृति को नहीं मान सकते।
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महाकुंभ में मुसलमान जाएंगे या नही, पूरे देश मे यह बहस खूब चली। इस बहस में न पड़ते हुए कई मुसलमान गए भी और स्नान भी किए। मुस्लिम महिला फाउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं हनुमान चालीसा फेम नाज़नीन अंसारी सोमवार ने वीआईपी घाट पर पहुंचकर पवित्र स्नान किया। संगम से ही भारतीय संस्कृति का पताका फहराया। नाज़नीन अंसारी के साथ नरेंद्र मोदी पर डॉक्टरेट करने वाली डॉ नजमा परवीन, ताजीम भारतवंशी एवं अफरोज पांडेय मोनी भी संगम पहुंचे।
नाज़नीन ने स्नान कर मां गंगा, मां यमुना, मां सरस्वती को पूरे श्रद्धा के साथ प्रणाम किया। कहा कि स्नान के बाद वह बहुत ही आनंदित हैं। उन्होंने कहा कि महाकुंभ में स्नान करना हमारे पूर्वजों की परंपरा और भारतीय संस्कृति है। हम किसी भी कीमत पर अरबी संस्कृति को नहीं मान सकते। हम भारत की संस्कृति के हिस्सा हैं और मरते दम तक उसी के संवर्धन के लिए काम करते रहेंगे।
हमें नकली अरबी, तुर्की, ईरानी बनने का कोई शौक नहीं है। अरब की संस्कृति मानकर कोई दूसरे देश में कैसे रह सकता है। संस्कृति और परंपरा पूर्वजों से चलती है। इसी से गोत्र और जाति भी आती है। महाकुंभ में स्नान करें,रामजी की आरती करें और देश का सम्मान करें तो किसी को क्या ऐतराज हो सकता है। अब तो यह प्रमाणित हो गया है कि सनातन संस्कृति पूर्णतः विज्ञान पर आधारित है।
सनातन ही स्थापित कर सकता है विश्व में शांति
इसलिए सिर्फ सनातन संस्कृति में ही वो दम है जो शांति स्थापित कर सकती है। अरब समेत मुस्लिम देशों को यही कहना चाहती हूं कि अगर अपने देश में स्थायी शांति चाहते हैं तो भारत की संस्कृति को अपने यहां लागू करें। सनातन संस्कृति स्वीकार्यता के आधार पर चलता है, नफरत के आधार पर नहीं। नाज़नीन ने कहा कि भारत की संस्कृति में जन्नत जाने का आधार कर्म को बताया गया है। मैं महाकुंभ स्नान करके कर्म अच्छा की हूं, इसलिए मेरे लिए जन्नत का दरवाजा खुला होगा।
भारत मे रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति सांस्कृतिक रूप से सनातनी है ,हिन्दू है। सबकी जाति और गोत्र है। हम सभी को अपने पूर्वजों के नाम, परंपरा, जाति, गोत्र और स्थान के अनुसार जीना चाहिए, तभी हम सम्मान पा सकते हैं। विशाल भारत संस्थान की राष्ट्रीय परिषद सदस्य डॉ. नजमा परवीन ने कहा कि " महाकुंभ में स्नान अपनी संस्कृति का सम्मान है। संगम पर स्नान के बाद समरसता का बोध स्वयं जागृत हो जाता है। न कोई जाति पूछ रहा था, न धर्म, सब बस एक ही उद्देश्य से आए थे स्नान हो जाए और एक रहें। सब एक दूसरे की मदद कर रहे थे।
महाकुंभ में दिखी सनातन की एकता
महाकुंभ नफरत फैलाने वालों के मुंह पर करोड़ों लोगों की एकजुटता है। जो प्रेम ,शांति और समरसता चाहते हैं। हम अरबी ,ईरानी ,तुरानी ,यूनानी, तुर्की की संस्कृति को कभी नहीं मानेंगे और न उससे पहचाने जाएंगे। इसलिए जयकार भारत की महान संस्कृति की और महाकुंभ की। अफरोज पांडेय ने कहा कि हमने पूर्वजों की इच्छा पूरी की है। स्नान के बाद मन पवित्र हो गया। अब तो अपने देश की संस्कृति के लिए ही जीना है।