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मुस्लिमों के वसीयत अधिकार पर खड़े हुए सवाल

Thu, 05 Nov 2015 01:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 05 Nov 2015 01:38 AM IST
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Muslims will stand on the right questions
इलाहाबाद(ब्यूरो)। मुस्लिमों के वसीयत करने के अधिकार का मामला हाईकोर्ट के समक्ष उठा है। कोई मुस्लिम अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत कर सकता है या नहीं इस विधिक प्रश्न पर हाईकोर्ट की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। अदालत के सामने यह भी सवाल है कि बिना वारिसों को नोटिस जारी कर सूचना सिर्फ अखबार में प्रकाशित करवाकर वसीयत की मान्यत प्राप्त करना (लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन) वैधानिक है अथवा नहीं।
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गाजियाबाद के कैसूर इस्लाम की विशेष अपील को सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति राकेश तिवारी और न्यायमूर्ति शशिकांत की खंडपीठ ने इन प्रश्नों को विचारणीय माना है। याची के मामा मोहम्मद अली ने नि:संतान होने के कारण अपनी संपत्ति उसे दान कर दी थी। बाद में उसे नोटिस दिए बिना सिर्फ अखबार में सूचना प्रकाशित करवाकर उन्होंने उसी संपत्ति की वसीयत दूसरे व्यक्ति कर दी। फिर हाईकोर्ट में वाद दायर कर इसका प्रमाणपत्र (लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन) जारी करवा लिया। याची ने इसके खिलाफ अपील दाखिल की।
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याची के वकील निमाई दास की दलील थी कि मोहम्मद अली को संपत्ति दान में मिली थी, जिसकी वसीयत करने का अधिकार नहीं है। यदि वसीयत को सही भी मान लिया जाए मुस्लिम लॉ के अनुसार उसे एक तिहाई से अधिक संपत्ति की वसीयत का अधिकार नहीं है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधान मुस्लिमों पर लागू नहीं होंगे। याची को दान में प्राप्त संपत्ति के दो तिहाई पर अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि यह एक विधिक प्रश्न है जिस पर विचार की आवश्यकता है।
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