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हाईकोर्ट : आपराधिक मुकदमे में बरी होना बर्खास्तगी रद्द करने का आधार नहीं , जीआरपी सिपाही को नहीं मिली राहत
Thu, 03 Sep 2026 03:39 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 03 Sep 2026 03:39 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में कर्मचारी के बरी होने मात्र से विभागीय जांच में साबित कदाचार और उसके आधार पर की गई बर्खास्तगी स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। आपराधिक मुकदमे और विभागीय कार्यवाही दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
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अदालत का आदेश
- फोटो : istock
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में कर्मचारी के बरी होने मात्र से विभागीय जांच में साबित कदाचार और उसके आधार पर की गई बर्खास्तगी स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। आपराधिक मुकदमे और विभागीय कार्यवाही दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। दोनों में साक्ष्य के मूल्यांकन और प्रमाण के मानक भी अलग होते हैं।
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने मुरादाबाद में तैनात रहे कांस्टेबल करमवीर सिंह राठी की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने सभी की सेवा समाप्ति, अपील और पुनरीक्षण में पारित आदेशों में हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए उनकी बर्खास्तगी बरकरार रखी।
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याची नौ जून 2013 को बड़वाल थाने में तैनात था। आरोप लगा कि सत्याग्रह एक्सप्रेस ट्रेन में ड्यूटी के दौरान नशे की हालत में उसने यात्रियों से मारपीट की और रुपये छीने। इस संबंध में सीतापुर के जीआरपी थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। इसके बाद उसे निलंबित कर विभागीय जांच शुरू की गई।
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विभागीय जांच में नशे में होने, अनुशासनहीनता, कर्तव्य के प्रति लापरवाही, यात्रियों से दुर्व्यवहार और आपराधिक मामले की जानकारी विभाग को न देने और जेल से रिहा होने के बाद अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने के आरोप भी लगाए गए। जांच अधिकारी ने आरोप सिद्ध पाए थे। इसके आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
इस बीच आपराधिक मुकदमे में याची को सात नवंबर 2015 को बरी कर दिया गया। याची ने इसी आधार पर विभागीय कार्रवाई रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला दिया। कहा कि विभागीय जांच में दोष सिद्ध करने के लिए संभावनाओं की प्रबलता का मानक लागू होता है, जबकि आपराधिक मुकदमे में आरोप संदेह से परे साबित करना होता है।
कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में गवाहों ने याची के खिलाफ बयान दिए थे। इसके अलावा आपराधिक मुकदमे के अतिरिक्त विभागीय जांच में आपराधिक मामले की सूचना न देना और अनधिकृत अनुपस्थिति जैसे आरोप भी थे। इसलिए आपराधिक अदालत के फैसले के आधार पर विभागीय जांच के निष्कर्षों को पलटने का कोई आधार नहीं था।