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डबल इंट्री में अटका अरबों का राजस्व
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 28 Jun 2016 02:13 AM IST
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शहर में पचास फीसदी से अधिक जमीन विवादों में घिरी हुई है। इन्हीं में से बड़ा हिस्सा डबल इंट्री का भी है। डबल इंट्री यानी ऐसी जमीन जो नजूल के साथ राजकीय आस्थान के अभिलेखों में भी दर्ज हो। डबल इंट्री की आड़ में भूमाफिया ने करोड़ों रुपये कमाए और कई अफसर भी मालामाल हो गए। फिलहाल इन दिनों ऐसी विवादित जमीनों के फ्रीहोल्ड पर रोक है। शहर में दो सौ से अधिक भूखंड इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसी जमीनों का क्या होगा, यह तय करने का निर्णय अब राजस्व परिषद पर छोड़ दिया गया है।
नजूल की वह भूमि जो पट्टे पर नहीं दी गई थी, वह नजूल के साथ राजकीय आस्थान के अभिलेखों में भी दर्ज कर ली गई। इलाहाबाद में ऐसे 217 भूखंड चिह्नित किए गए हैं। इनकी कीमत अरबों रुपये में है। नजूल भूमि तो फ्रीहोल्ड हो जाती है, लेकिन राजकीय आस्थान की जमीन को फ्रीहोल्ड किए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। कुछ दिनों पहले शासन स्तर से एक आदेश जारी कर ऐसे मामलों का निपटारा करने को कहा गया था, लेकिन विवाद इतना ज्यादा है कि अफसरों ने इससे हाथ पीछे खींच लिए। मामला मुख्य सचिव के पास पहुंचा और उन्होंने इस पर निर्णय लेने का अधिकार राजस्व परिषद पर छोड़ दिया।
इन दिनों राजकीय आस्थान की भूमि को फ्रीहोल्ड किए जाने के लिए प्रस्तावित नीति तैयार की जा रही है। अगर इस नीति को मंजूरी मिलती है तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि डबल इंट्री वाली भूमि को किस आधार पर फ्रीहोल्ड किया जाए। मतलब यह कि उसे नजूल माना जाए या राजकीय आस्थान मानकर फ्रीहोल्ड किया जाए। राजस्व परिषद को इसी पर निर्णय लेना है। फिलहाल ऐसी जमीनों की फ्रीहोल्ड प्रक्रिया ठप होने के कारण सरकार को अरबों रुपये के राजस्व की हानि हो रही है। साथ ही जनता भी परेशान है। लोग भूमि को फ्रीहोल्ड कराने के लिए जिला प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन नीति स्पष्ट न होने के कारण पूरा मामला अटका हुआ है।
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नजूल की वह भूमि जो पट्टे पर नहीं दी गई थी, वह नजूल के साथ राजकीय आस्थान के अभिलेखों में भी दर्ज कर ली गई। इलाहाबाद में ऐसे 217 भूखंड चिह्नित किए गए हैं। इनकी कीमत अरबों रुपये में है। नजूल भूमि तो फ्रीहोल्ड हो जाती है, लेकिन राजकीय आस्थान की जमीन को फ्रीहोल्ड किए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। कुछ दिनों पहले शासन स्तर से एक आदेश जारी कर ऐसे मामलों का निपटारा करने को कहा गया था, लेकिन विवाद इतना ज्यादा है कि अफसरों ने इससे हाथ पीछे खींच लिए। मामला मुख्य सचिव के पास पहुंचा और उन्होंने इस पर निर्णय लेने का अधिकार राजस्व परिषद पर छोड़ दिया।
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इन दिनों राजकीय आस्थान की भूमि को फ्रीहोल्ड किए जाने के लिए प्रस्तावित नीति तैयार की जा रही है। अगर इस नीति को मंजूरी मिलती है तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि डबल इंट्री वाली भूमि को किस आधार पर फ्रीहोल्ड किया जाए। मतलब यह कि उसे नजूल माना जाए या राजकीय आस्थान मानकर फ्रीहोल्ड किया जाए। राजस्व परिषद को इसी पर निर्णय लेना है। फिलहाल ऐसी जमीनों की फ्रीहोल्ड प्रक्रिया ठप होने के कारण सरकार को अरबों रुपये के राजस्व की हानि हो रही है। साथ ही जनता भी परेशान है। लोग भूमि को फ्रीहोल्ड कराने के लिए जिला प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन नीति स्पष्ट न होने के कारण पूरा मामला अटका हुआ है।
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