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UP: एक फैसला ऐसा भी...पत्नी को 15 रुपये में बेचा, ब्रिटिश कोर्ट ने लगाई थी मुहर; महिला बोली-सहमति से हुआ सौदा

Mon, 24 Aug 2026 12:48 PM IST
Sharukh Khan शशांक वर्मा, अमर उजाला, प्रयागराज
शशांक वर्मा, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: Sharukh Khan Updated Mon, 24 Aug 2026 12:48 PM IST
सार

साल 1809 का एक फैसला इलाहाबाद के विधि संग्रहालय में संरक्षित है। यह फैसला था पत्नी को 15 रुपये में बेचने का। ब्रिटिश कोर्ट में महिला का बयान हुआ, जिसमें उसने यह स्वीकार किया कि सौदा उसकी सहमति से हुआ। कोर्ट ने कहा कि यह सौदा जायज है। इस पर कोर्ट ने मुहर लगा दी थी।

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A Bizarre 1809 Verdict British Court Approved  Husband Selling wife know update in hindi
प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट का विधि संग्रहालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

औरतों को बेचने के किस्से तो सुनने को कई मिल जाएंगे। अदालत ने इसे जायज ठहराया हो, ऐसा विरला निर्णय ब्रिटिश कोर्ट ने दिया था। पति ने अपनी पत्नी को 15 रुपये में बेचा और तीन जजों की बेंच ने उस सौदे पर मुहर लगाई। वर्ष 1809 का यह फैसला इलाहाबाद के विधि संग्रहालय में संरक्षित है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का विधि संग्रहालय अपने आप में अनूठा है, जिसने ऐतिहासिक दुर्लभ न्यायिक दस्तावेजों व सांस्कृतिक सामग्रियों को संजोया है। ऐसे दस्तावेजों में से एक है पत्नी के बेचे जाने पर अंग्रेजी कोर्ट का निर्णय।
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19वीं शताब्दी की शुरुआत में बंगाल में देवमती नाम की एक महिला को उसके पति ने गैर के हाथों 15 रुपये में बेच दिया था। बाद में देवमती की मां ने इसके खिलाफ कोर्ट में गुहार लगाई। बेटी को वापस कराने का मांग रखी।
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जज जॉन हर्बर्ट हॉर्निक्टन, जेम्स और स्टीवर्ट की बेंच ने इसकी सुनवाई की। महिला का बयान हुआ, जिसमें उसने यह स्वीकार किया कि सौदा उसकी सहमति से हुआ। जजों ने इस मामले में धर्मगुरुओं को शास्त्र के अनुसार अपनी सलाह देने को कहा, जिन्होंने कोर्ट को बताया कि महिला की बिक्री उसकी सहमति से हुई, इसलिए यह सौदा जायज है। इस पर कोर्ट ने मुहर लगा दी थी।

न्यायिक कार्यों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि उस वक्त ब्रिटिश कोर्ट वित्तीय-व्यापारिक मामलों में ही ज्यादा दिलचस्पी लेती थी। दीवानी मामलों में समाज, धर्म-संप्रदाय से जुड़े विशिष्ट लोगों (जूरी) की सलाह पर निर्णय दिया करती थी। यह निर्णय दुर्लभ था, इसीलिए संरक्षित किया गया। जनता इसका अवलोकन कर सकती है।
 

कोर्ट नंबर 21 में आज भी देखी जा सकती जूरी बेंच
इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर 21 में आज भी जूरी के बैठने का स्थान देखा जा सकता है। आजादी के बाद भी कई वर्षों से तक यह जूरी काम करती थी, जिसमें शहर के मानिंद लोग शामिल होते थे। सुनवाई के दौरान मौजूद रहते और बाद अपना फैसला कोर्ट के समक्ष रखते थे, जो कोर्ट के लिए मायने रखता था।
 

नानावटी केस के बाद खत्म कर दी गई जूरी बेंच
अपर महाधिवक्ता और केंद्र सरकार के पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अशोक मेहता बताते हैं कि जूरी फैक्ट और अदालत कानून के आधार पर निर्णय करती थी। 1956-57 में महाराष्ट्र में नानावटी केस के बाद जूरी बंद कर दी गई। इस केस में नौसेना अधिकारी केएम नानावटी ने अपनी पत्नी सिल्विया के प्रेमी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसमें जूरी ने नानावटी को निर्दोष बताया लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से उसे सजा हुई।
 

महिला को बेचे जाने और सही ठहराने का मामला एक नजरिये को प्रकट करता है। अंग्रेजी राज में महिलाओं को संपत्ति समझा जाता था। भारत में महिला और पुरुष में भेद नहीं है। आजादी के बाद ही भारतीय संविधान ने दोनों को मताधिकार दिए। जबकि ब्रिटेन ने इसे लागू करने में काफी वक्त लगाया। - अशोक मेहता अपर महाधिवक्ता एवं पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भारत सरकार
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