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Mahakumbh : गंगा के किनारे खुले में शौच पर एनजीटी ने यूपीपीसीबी और सरकार को थमाया नोटिस, मामले की सुनवाई कल
Sun, 23 Feb 2025 05:55 AM IST
दुष्यंत शर्मा
नितिन राजपूत, नई दिल्ली
नितिन राजपूत, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 23 Feb 2025 05:55 AM IST
सार
याचिकाकर्ता निपुण भूषण ने यह दावा करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष विस्तृत याचिका दायर की है। शिकायतकर्ता ने अपने दावे को पुष्ट करने के लिए साक्ष्यों से जुड़े वीडियो का पेनड्राइव भी अधिकरण को सौंपा है।
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एनजीटी
- फोटो : संवाद
विस्तार
प्रयागराज में जारी महाकुंभ में स्वच्छ जैव-शौचालयों की कमी या उनके इस्तेमाल करने लायक न होने की वजह से लाखों लोग गंगा नदी के किनारे खुले में शौच करने को मजबूर हैं। याचिकाकर्ता निपुण भूषण ने यह दावा करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष विस्तृत याचिका दायर की है। शिकायतकर्ता ने अपने दावे को पुष्ट करने के लिए साक्ष्यों से जुड़े वीडियो का पेनड्राइव भी अधिकरण को सौंपा है।
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शिकायत की गंभीरता को देखते हुए अधिकरण ने यूपी सरकार, प्रयागराज मेला प्राधिकरण और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को नोटिस जारी किया है। एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल की पीठ ने अधिकारियों को अगली सुनवाई से एक सप्ताह पहले जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई 24 फरवरी को होगी।
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अदालत ने कहा कि यदि कोई प्रतिवादी वकील के माध्यम के बजाय सीधे उत्तर दाखिल करता है, तो प्रतिवादी अधिकरण की सहायता के लिए वर्चअुली उपस्थित रहेगा। साथ ही, आवेदक को निर्देश दिया जाता है कि वह प्रतिवादियों को सेवा प्रदान करे और सुनवाई की अगली तारीख से कम से कम एक सप्ताह पहले सेवा का हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने कहा कि याचिका में बताया गया है कि आगंतुकों की तरफ से रिकॉर्ड किए गए वीडियो में कथित तौर पर नदी के किनारे मानव मल जमा होता हुआ दिखाई देता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करता है।
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याचिकाकर्ता ने कहा 10 करोड़ का पर्यावरण मुआवजा दिया जाए
याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश सरकार से 10 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा मांगा है। इसमें कहा गया था कि कुंभ मेला स्थल पर स्वच्छता सुविधाओं की खराब व्यवस्था के कारण राज्य बड़े पैमाने पर प्रदूषण को रोकने में विफल रहा है। इस तरह के मुआवजे की अपनी मांग का समर्थन करने के लिए भूषण ने प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत का हवाला दिया, जो पर्यावरण कानून में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त सिद्धांत है, जिसके अनुसार प्रदूषणकर्ता को पर्यावरण को होने वाले नुकसान की लागत वहन करनी होती है।
आवेदन ने संविधान के अनुच्छेद 48ए के तहत कर्तव्य की उपेक्षा का भी आरोप लगाया है, जो राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने के लिए बाध्य करता है। सामूहिक रूप से खुले में शौच की अनुमति देना और प्रदूषण को रोकने में विफल होना इस सांविधानिक जनादेश का उल्लंघन है।