Holi 2025 : इलाहाबाद जैसी होली दुनिया में और कहीं नहीं होती, पूरा शहर ही एक रंग में रंगने के लिए तैयार
इलाहाबाद के जैसी होली कहीं नहीं होती। पूरा शहर ही एक रंग में रंग उठता है। लोकनाथ, दारागंज, मुट्ठीगंज, अतरसुइया और बांसमंडी ये सारे के सारे मोहल्ले नए सिरे से जाग उठते हैं। कपड़ा-फाड़ होली को भला कोई कैसे भूल सकता है।
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इलाहाबाद के जैसी होली कहीं नहीं होती। पूरा शहर ही एक रंग में रंग उठता है। लोकनाथ, दारागंज, मुट्ठीगंज, अतरसुइया और बांसमंडी ये सारे के सारे मोहल्ले नए सिरे से जाग उठते हैं। कपड़ा-फाड़ होली को भला कोई कैसे भूल सकता है। स्टेनली रोड से फाफामऊ तक सड़कों पर महुआ चू रहा है। सड़कें भी जैसे आदमी की तरह ही लहरा रही हैं। इस बार भी होली का रंग शहर पर चढ़ चुका है। ठठेरी बाजार में पिचकारियां सक्रिय हो गई हैं। हर तरफ नाकाबंदी चल रही है। होली आई रे कन्हाई की अनुगूंज हवाओं में है।
नेतराम से सुलाकी तक गुझियों का महोत्सव चल रहा है। छतों पर पापड़ सूख रहे हैं। घरैतिन मठरी पर मठरी छाने जा रही हैं। इधर, मिश्राजी ने सुबह से ही भांग चढ़ा ली है, वो उड़े जा रहे हैं और मिश्राइन चाची से रोमांटिक हो रहे हैं। कैलाश गौतम के फागुनी गीतों को एक बार फिर शहर याद कर रहा है।
चार आंखों में बंटा, बंटकर उजाला खिल उठा
फिर गुलाबी धूप में, पीला शिवाला खिल उठा।
असली इलाहाबाद देखना हो तो निरंजन पुल पार आइए
असली इलाहाबाद देखना है तो निरंजन पुल पार आइए
इलाहाबाद में होते रहे होलियाना आयोजनों की याद आ रही है। महामूर्ख सम्मेलन और हुड़दंग आज भी मन में करवट ले रहे हैं। असली इलाहाबाद देखना हो तो निरंजन पुल पार आइए। सादिक मियां रंग और गुलाल बेच रहे हैं तो कन्हैया बाबू ईद की टोपियां बेच रहे हैं। रमजान का महीना चल रहा है, तो फागुन भी उफान पर है। एक गंगा-यमुना यहां भी साकार हो रही है। यही है हमारी संस्कृति का संगम। हमारा शहर ही उत्सवों का शहर है। अभी-अभी महाकुंभ संपन्न हुआ है। दशहरा, दिवाली हो या फिर नवरात्र के दिन, हर दिन त्योहार की गंध में भीगा होता है अपना यह शहर। इस बार तो चार दिन पहले से ही शहर में होली की शुरुआत हो चुकी है, वो दिन भी क्या अद्भुत दिन था, जब भारत के चैंपियन बनने पर पूरा लोकनाथ ही रंगों से सराबोर हो उठा था।
होली पर अपना जन्मदिन मनाती थीं महादेवी वर्मा
सच कहिए तो इलाहाबाद जनवरी से ही जब से मेला शुरू हुआ है, होली मना रहा है। एक बार की महादेवी जी के आंगन की होली याद आ रही है। महादेवीजी होली पर ही अपना जन्मदिन मनाया करती थीं। उनके घर पर ही अच्छा खासा साहित्यिक कुंभ लग जाया करता था। रंग, अबीर के बादल उड़ते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही माहौल था। सुबह-सुबह अमृत राय बूटी चढ़ाकर महादेवीजी के घर आ गए थे और उनके पैरों पर साष्टांग हो गए थे और इस जिद पर आ गए थे कि वो तब तक महादेवी जी के कदमों से नहीं उठेंगे, जब तक वो खुद अपना प्रसिद्ध गीत, मैं नीर भरी दुख की बदली, गाकर सुनाने का वचन नहीं देतीं। दुनिया जानती है कि गाने की कौन कहे, महादेवीजी खुद अपनी कविता कभी यूं भी नहीं पढ़ती थीं। इधर, सब लोग अमृतजी को महादेवी जी के कदमों से खींच रहे थे और उधर अमृतजी जाेर-जोर से रोकर यही कहे जा रहे थे कि आज दीदी महादेवी जी का सस्वर पाठ सुनना ही है।
होली की पुरानी यादें हुईं ताजा
आखिर महीयसी को अमृत राय के बालहठ के सामने झुकना ही पड़ा और महादेवीजी ने मैं नीर भरी दुख की बदली, गाया तो नहीं, मगर गुनगुना अवश्य दिया और यह भी बताया कि इस गीत को उन्होंने इसी तरह गुनगुनाते हुए लिखा भी था। महादेवीजी की जीवन से भरी गुनगुनाहट को सुनकर अमृत रायजी की ठंडाई का असर कुछ कम होने लगा था। महादेवीजी अमृतजी के पिता मुंशी प्रेमचंद को भावुक होकर याद किए जा रही थीं और याद कर रही थीं कि आज तो जैसे अमृत भाई में निरालाजी की आत्मा ही समा गई थी। उस दिन सबने महादेवीजी के हाथ की गुझिया भी खाई थी। उस गुझिया की मिठास आज तक मन में है। इलाहाबाद की होली इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसी दिन देश को महादेवीजी जैसी सरस्वती मिली थीं। उनकी याद में भी अनंत काल तक इस शहर में होली होती रहेगी।