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शब-ए-बरात पर कब्रिस्तानों में लगे ताले, घरों पर चिरागा

Fri, 10 Apr 2020 12:36 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Fri, 10 Apr 2020 12:36 AM IST
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locks in the cemetery on the shabe procession a lamp in the houses in memory of the ancestors
शब-ए-बरात पर बृहस्पतिवार को मुस्लिम समुदाय को लोग अपने पूर्वजों की कब्रों पर चिरागां करने नहीं जा सके। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच मौलानाओं ने कब्रों पर जाने की बजाए घरों में ही फातिहा पढ़ने और इबादत करने की अपील की थी, लेकिन इस बीच प्रशासन ने कब्रिस्तानों के प्रवेश द्वारों पर बैरिकेडिंग करवा दी। कुछ छोटे कब्रिस्तानों पर ताले लगा दिए गए,ताकि वहां लोग प्रवेश न कर सकें और मजमा लगने से रोका जा सके। इस दौरान घरों में ही लोगों ने फातिहा पढ़ी और इबादत कर पुरखों की याद में चिरागां किया।
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कोरोना के डर से लॉकडाउन के बीच शबे बरात पर बृहस्पतिवार को हजारों साल पुरानी परंपरा पुरखों को याद में कब्रों पर चिरागां करने की परंपरा टूट गई। शहर -ए-काजी मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी और कब्रिस्तान कमेटी की अध्यक्ष समेत अन्य मौलानाओं की अपील पर कोरोना से जंग जीतने के लिए मुस्लिम समुदाय के लोग शब-ए-बारात पर घरों से नहीं निकले। इस बार घर पर ही शबे -ए -बरात मनाई गई। शाम होते ही जहां कब्रिस्तानों पर जियारत करने वालों का तांता लग जाता था और शर्बत का वितरण करने वाले गलियों में लोगों को चाय, बिस्किट और शर्बथ परोसने में जुट जाते थे, वहीं इस शाम कब्रिस्तान जाने वाली गलियों में सियापा छाया रहा। अटाला पर तकिया कब्रिस्तान में सन्नाटा था, यहां बैरिकेडिंग कराकर रास्ता बंद करवा दिया गया था। इसी तरह हिम्मतगंज, कालाडांडा व दरियाबाद कब्रिस्तानों के रास्तों पर भी बैरिकेडिंग करा दी गई। छोटे कब्रिस्तानों के गेट पर ताले लगे दिए गए थे। इस दौरान घर-घर में कोरोना से खुद को एवं देश और दुनिया को बचाने के लिए हाथ उठा कर दुआएं की गई। अटाला व्यापार मंडल के अध्यक्ष फैयाज अहमद ने बताया कि महामारी के खौफ से यह पहला मौका था, जब कब्रों पर चिराग नहीं जले, बल्कि ताले लगा दिए गए। ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता अफसर महमूद व इफ्तेखार अहमद मंदर ने बताया कि उनकी याद में शबे बरात पर ऐसा कभी नही हुआ था।
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रात को छतों से अजान,मुल्क की सलामती की मांगी दुआ
रात ठीक 10 बजे घरों से अजान का एहतमाम किया गया। शहर-ए- काजी शफीक अहमद शरीफी की अपील को सिर -आंखों पर रखते हुए कब्रिस्तान की तरफ ना जाने का फैसला लिया गया। इस बार कोरोना के खौफ की वजह से ना ही मस्जिदों में कुमकुम लगाए गए, ना ही वहां पर किसी प्रकार की इबादत का इंतजाम किया गया। ना ही कब्रिस्तानों में किसी प्रकार लाइटिंग की व्यवस्था की गई। लोगों ने मुल्क की सलामती की दुआ की। कहा कि देश बचेगा, देशवासी बचेंगे तभी फिर अगले वर्ष रीति रिवाज के साथ शब-ए-बरात मनाएंगे।
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