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ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम का विवाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 21 Aug 2015 01:52 AM IST
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इलाहाबाद। ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य की गद्दी को लेकर चल रहे अदालती विवाद में गुरुवार को स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। दो सप्ताह तक चली लंबी बहस के बाद अदालत ने सिविल कोर्ट का फैसला स्टे करने से इंकार करते हुए स्थगनादेश अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद वासुदेवानंद को अपने दावे के लिए अपील पर अंतिम फैसले के लिए इंतजार करना होगा। सिविल कोर्ट ने पांच मई 2015 को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योतिष्पीठ का वास्तविक दावेदार मानते हुए वासुदेवानंद को शंकराचार्य की पदवी धारण करने से रोक दिया था।
वासुदेवानंद ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर सिविल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। फैसला आने तक उन्होंने सिविल कोर्ट का फैसला स्थगित रखने की मांग की थी। उनकी अर्जी पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति बीके श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई की। वासुदेवानंद के वकील मनीष गोयल ने उनका पक्ष रखते हुए कहा कि स्वरूपानंद सरस्वती का दावा पोषणीय नहीं है। अंतरिम आदेश नहीं मिलने से स्वामी वासुदेवानंद को अपूर्णनीय क्षति होगी।
शंकराचार्य स्वरूपानंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशिनंदन और अनूप त्रिवेदी ने अंतरिम आदेश की मांग का विरोध किया। वकीलों का कहना था कि स्वरूपानंद को काशी विद्वत परिषद् ने शंकराचार्य की गद्दी पदास्थापित किया है। वह ब्रह्मानंद सरस्वती के शिष्य हैं। वासुदेवानंद जिस वसीयत के आधार पर स्वयं को शंकराचार्य की गद्दी का दावेदार बता रहे हैं उस वसीयत को ही सिविल कोर्ट ने फर्जी करार दे दिया है। सिविल कोर्ट ने वासुदेवानंद को शंकराचार्य पद के अर्ह भी नहीं माना है। शंकराचार्य बनने के जिन योग्यताओं का जिक्र म्हमनाय में किया गया है, वह उनमें नहीं है।
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पीठ ने अर्जी खारिज करते हुए की अंतरिम आदेश के लिए तीन बातों का होना आवश्यक है। पहला, प्रथम दृष्टया केस साबित होना चाहिए, दूसरा, न्याय का संतुलन और तीसरा अपूर्णनीय क्षति की संभावना। वासुदेवानंद के पक्ष में इन तीनों में से कोई भी बात नहीं है। न तो न्याय का संतुलन है और न ही अपूर्णनीय क्षति की संभावना। इस स्थिति में अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता है। हालांकि अदालत ने अपील पर नौ सितंबर से सुनवाई प्रारंभ करने का निर्देश दिया है। उम्मीद है कि इस मामले में अंतिम निर्णय भी शीध्र ही आ जाएगा।
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वासुदेवानंद ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर सिविल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। फैसला आने तक उन्होंने सिविल कोर्ट का फैसला स्थगित रखने की मांग की थी। उनकी अर्जी पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति बीके श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई की। वासुदेवानंद के वकील मनीष गोयल ने उनका पक्ष रखते हुए कहा कि स्वरूपानंद सरस्वती का दावा पोषणीय नहीं है। अंतरिम आदेश नहीं मिलने से स्वामी वासुदेवानंद को अपूर्णनीय क्षति होगी।
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शंकराचार्य स्वरूपानंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशिनंदन और अनूप त्रिवेदी ने अंतरिम आदेश की मांग का विरोध किया। वकीलों का कहना था कि स्वरूपानंद को काशी विद्वत परिषद् ने शंकराचार्य की गद्दी पदास्थापित किया है। वह ब्रह्मानंद सरस्वती के शिष्य हैं। वासुदेवानंद जिस वसीयत के आधार पर स्वयं को शंकराचार्य की गद्दी का दावेदार बता रहे हैं उस वसीयत को ही सिविल कोर्ट ने फर्जी करार दे दिया है। सिविल कोर्ट ने वासुदेवानंद को शंकराचार्य पद के अर्ह भी नहीं माना है। शंकराचार्य बनने के जिन योग्यताओं का जिक्र म्हमनाय में किया गया है, वह उनमें नहीं है।
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पीठ ने अर्जी खारिज करते हुए की अंतरिम आदेश के लिए तीन बातों का होना आवश्यक है। पहला, प्रथम दृष्टया केस साबित होना चाहिए, दूसरा, न्याय का संतुलन और तीसरा अपूर्णनीय क्षति की संभावना। वासुदेवानंद के पक्ष में इन तीनों में से कोई भी बात नहीं है। न तो न्याय का संतुलन है और न ही अपूर्णनीय क्षति की संभावना। इस स्थिति में अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता है। हालांकि अदालत ने अपील पर नौ सितंबर से सुनवाई प्रारंभ करने का निर्देश दिया है। उम्मीद है कि इस मामले में अंतिम निर्णय भी शीध्र ही आ जाएगा।