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माई लार्ड 150 वर्षों की न्याय यात्रा में हमें क्या मिला
अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Tue, 29 Nov 2016 01:39 AM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थापना के 150 गौरवशाली वर्षों और इसके भवन के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में हाईकोर्ट जश्न मना रहा है। तमाम समारोहों और कार्यक्रम के जरिए इन गौरवशाली वर्षों और उपलब्धियों को याद किया जा रहा है, मगर इन सबके बीच आम आदमी यह भी पूछा रहा है कि इन डेढ़ सौ वर्षों की यात्रा में उसे क्या हासिल हुआ। यह सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही न्यायाधीश जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने उठाया है। मुख्य न्यायाधीश और बार एसोसिएशन को लिखे पत्र में जस्टिस अग्रवाल ने आम वादकारी के हित में कदम उठाने की अपील भी की है।
शनिवार को आयोजित शताब्दी समारोह के मौके पर आम वादकारी को भूलने पर चिंता जाहिर करते हुए जस्टिस अग्रवाल ने कहा है कि आम आदमी यह पूछा रहा है कि इन 150 वर्षों की न्याय यात्रा में उसे क्या हासिल हुआ सिवाए मुकदमों के फैसलों का वर्षों इंतजार करने और तारीखें गिनने के। हाईकोर्ट में लाखों मुकदमे विचाराधीन हैं और वादकारी दशकों से न्याय की आस लगाए हैं। हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे जनता को एहसास हो कि न्यायपालिका अविलंब न्याय देने को लेकर गंभीर है। जस्टिस अग्रवाल ने सुझाव दिया है कि क्यों न डेढ़ सौ स्थापना वर्ष पूरा होने से पूर्व हम अगले वर्ष 17 जनवरी से 17 मार्च के बीच पड़ने वाले हर शनिवार को अदालत खुली रखें और इस दौरान 2010 से पहले के मुकदमों को निपटाया जाए। इन दिनों में नए मुकदमों की सुनवाई न की जाए। ऐसा करके हम हजारों पुराने मुकदमों को निपटा सकते हैं।
पत्र में उन्होंने कहा है कि समारोह में अपनी उपलब्धियां याद करते समय हम वादकारियों को भी उसमें शामिल करें। उन्हें पता चलना चाहिए कि जिनके लिए इस न्यायपालिका का गठन हुआ उनके लिए भी हम कुछ करना चाहते हैं। उन्होंने शनिवार को काम करने का प्रस्ताव पारित करने का सुझाव देते हुए कहा है कि यदि हम न्याय देने में गति ला सकें तो वह इस समारोह वर्ष की उपलब्धि होगी। जस्टिस अग्रवाल ने पत्र की प्रतियां मुख्य न्यायधीश दिलीप बी भोसले के अलावा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्षों को भी भेजी हैं।
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शनिवार को आयोजित शताब्दी समारोह के मौके पर आम वादकारी को भूलने पर चिंता जाहिर करते हुए जस्टिस अग्रवाल ने कहा है कि आम आदमी यह पूछा रहा है कि इन 150 वर्षों की न्याय यात्रा में उसे क्या हासिल हुआ सिवाए मुकदमों के फैसलों का वर्षों इंतजार करने और तारीखें गिनने के। हाईकोर्ट में लाखों मुकदमे विचाराधीन हैं और वादकारी दशकों से न्याय की आस लगाए हैं। हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे जनता को एहसास हो कि न्यायपालिका अविलंब न्याय देने को लेकर गंभीर है। जस्टिस अग्रवाल ने सुझाव दिया है कि क्यों न डेढ़ सौ स्थापना वर्ष पूरा होने से पूर्व हम अगले वर्ष 17 जनवरी से 17 मार्च के बीच पड़ने वाले हर शनिवार को अदालत खुली रखें और इस दौरान 2010 से पहले के मुकदमों को निपटाया जाए। इन दिनों में नए मुकदमों की सुनवाई न की जाए। ऐसा करके हम हजारों पुराने मुकदमों को निपटा सकते हैं।
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पत्र में उन्होंने कहा है कि समारोह में अपनी उपलब्धियां याद करते समय हम वादकारियों को भी उसमें शामिल करें। उन्हें पता चलना चाहिए कि जिनके लिए इस न्यायपालिका का गठन हुआ उनके लिए भी हम कुछ करना चाहते हैं। उन्होंने शनिवार को काम करने का प्रस्ताव पारित करने का सुझाव देते हुए कहा है कि यदि हम न्याय देने में गति ला सकें तो वह इस समारोह वर्ष की उपलब्धि होगी। जस्टिस अग्रवाल ने पत्र की प्रतियां मुख्य न्यायधीश दिलीप बी भोसले के अलावा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्षों को भी भेजी हैं।
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