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जस्टिस देवकीनंदन: मरते दम तक बने रहे 'रामसखा', मंदिर आंदोलन में निर्णायक साबित हुई भूमिका
Thu, 06 Aug 2020 11:44 AM IST
प्राची प्रियम
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
Published by: प्राची प्रियम
Updated Thu, 06 Aug 2020 11:44 AM IST
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जस्टिस (स्व.)देवकीनंदन अग्रवाल
- फोटो : अमर उजाला
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राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन को सफल बनाने में जिन नायकों को इतिहास कभी नहीं भुला नहीं पाएगा, उनमें एक नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस (स्व.)देवकीनंदन अग्रवाल का भी है।
मंदिर आंदोलन को निर्णायक विजय में बदलने में उनकी भूमिका अहम साबित हुई। यह जस्टिस देवकीनंदन की सूझबूझ का ही नतीजा है कि अदालत में फैसला न सिर्फ मंदिर के पक्ष में आया बल्कि राममंदिर के लिए भूमि अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो सका।
उन दिनों जस्टिस देवकीनंदन के सहयोगी रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण गुप्ता बताते हैं कि, मंदिर को लेकर फैजाबाद के सिविल कोर्ट में चल रहे मुकदमे में सबसे बड़ी अड़चन थी कि मंदिर का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था।
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जो पक्षकार मुकदमा लड़ रहे थे, उनका सीधे मंदिर से कोई जुड़ाव नहीं बनता था। ऐसे में जस्टिस देवकीनंदन ने ही सुझाया कि हमें रामलला विराजमान को ही पक्षकार बनाना चाहिए।
जब रामलला खुद पक्षकार बन जाएंगे तो यह अड़चन दूर हो जाएगी। प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति को सिविल कानून में जीवित व्यक्ति के समान दर्जा प्राप्त है। चूंकि रामलला ईश्वर हैं इसलिए उनकी मृत्यु नहीं हो सकती।
इस बारे में अशोक सिंहल से भी वार्ता हुई। उनकी सहमति मिलने के बाद उन्होंने एक जुलाई 1989 को लखनऊ खंडपीठ ने रामलला विराजमान को पक्षकार बनाने के लिए याचिका दाखिल की।
यह याचिका स्वीकार कर ली गई। मगर चूंकि रामलला विराजमान बाल रूप में हैं इसलिए उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए रामसखा की आवश्यकता थी। जस्टिस देवकीनंदन ने स्वयं को रामसखा के रूप में प्रस्तुत करते हुए सिविल सूट नंबर पांच दाखिल किया।
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मंदिर आंदोलन को निर्णायक विजय में बदलने में उनकी भूमिका अहम साबित हुई। यह जस्टिस देवकीनंदन की सूझबूझ का ही नतीजा है कि अदालत में फैसला न सिर्फ मंदिर के पक्ष में आया बल्कि राममंदिर के लिए भूमि अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो सका।
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उन दिनों जस्टिस देवकीनंदन के सहयोगी रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण गुप्ता बताते हैं कि, मंदिर को लेकर फैजाबाद के सिविल कोर्ट में चल रहे मुकदमे में सबसे बड़ी अड़चन थी कि मंदिर का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था।
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जो पक्षकार मुकदमा लड़ रहे थे, उनका सीधे मंदिर से कोई जुड़ाव नहीं बनता था। ऐसे में जस्टिस देवकीनंदन ने ही सुझाया कि हमें रामलला विराजमान को ही पक्षकार बनाना चाहिए।
जब रामलला खुद पक्षकार बन जाएंगे तो यह अड़चन दूर हो जाएगी। प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति को सिविल कानून में जीवित व्यक्ति के समान दर्जा प्राप्त है। चूंकि रामलला ईश्वर हैं इसलिए उनकी मृत्यु नहीं हो सकती।
इस बारे में अशोक सिंहल से भी वार्ता हुई। उनकी सहमति मिलने के बाद उन्होंने एक जुलाई 1989 को लखनऊ खंडपीठ ने रामलला विराजमान को पक्षकार बनाने के लिए याचिका दाखिल की।
यह याचिका स्वीकार कर ली गई। मगर चूंकि रामलला विराजमान बाल रूप में हैं इसलिए उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए रामसखा की आवश्यकता थी। जस्टिस देवकीनंदन ने स्वयं को रामसखा के रूप में प्रस्तुत करते हुए सिविल सूट नंबर पांच दाखिल किया।
उनको पक्षकार संख्या एक के तौर पर दर्ज किया गया। जस्टिस देवकीनंदन के मम्फोर्डगंज स्थित आवास पर ही इस अर्जी का पूरा ड्राफ्ट तैयार किया गया। उन्होंने खुद ‘इम्प्लीडमेंट’ अर्जी दाखिल की। यह कदम निर्णायक साबित हुआ।
रामलला विराजमान को पक्षकार बनाने का नतीजा यह रहा कि विवादित स्थल का फैसला रामलला के पक्ष में आया और सरकार भी बिना किसी बाधा के मंदिर के लिए भूमि अधिग्रहण कर सकी।
अन्यथा किसी अन्य संस्था अथवा व्यक्ति के लिए सरकार की ओर से अधिग्रहण करने में बाधा है। वह आठ अप्रैल 2002 को निधन होने तक रामसखा बने रहे। मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले अधिवक्ता देवेंद्र मणि त्रिपाठी कहते हैं, जस्टिस देवकीनंदन का योगदान आंदोलन में मील का पत्थर साबित हुआ।
इतना ही नहीं वह जबतक जीवित रहे, हम लोगों को निरंतर उनकी मदद मिलती रही। वह खुद सिविल कानून के माहिर वकील और जज थे। इसलिए कानूनी पेचीदगियों पर उनकी सलाह बहुत अहम और उपयोगी होती थी।
मां के कहने पर उठाया था मंदिर आंदोलन का बीड़ा
जस्टिस देवकीनंदन के नजदीकी रिश्तेदार अभय अग्रवाल कहते हैं कि सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी मां के कहने पर मंदिर आंदोलन में सहयोग करने का निर्णय लिया था।
उन्होंने अयोध्या में सरयू के तट पर जाकर शपथ ली थी कि रामलला का मंदिर बनवाने का हर संभव प्रयास करेंगे। अशोक सिंहल से उनकी काफी घनिष्ठता थी। वह अक्सर जस्टिस देवकी नंदन से मंदिर आंदोलन को लेकर सलाह लेने आते थे।
रामलला विराजमान को पक्षकार बनाने का नतीजा यह रहा कि विवादित स्थल का फैसला रामलला के पक्ष में आया और सरकार भी बिना किसी बाधा के मंदिर के लिए भूमि अधिग्रहण कर सकी।
अन्यथा किसी अन्य संस्था अथवा व्यक्ति के लिए सरकार की ओर से अधिग्रहण करने में बाधा है। वह आठ अप्रैल 2002 को निधन होने तक रामसखा बने रहे। मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले अधिवक्ता देवेंद्र मणि त्रिपाठी कहते हैं, जस्टिस देवकीनंदन का योगदान आंदोलन में मील का पत्थर साबित हुआ।
इतना ही नहीं वह जबतक जीवित रहे, हम लोगों को निरंतर उनकी मदद मिलती रही। वह खुद सिविल कानून के माहिर वकील और जज थे। इसलिए कानूनी पेचीदगियों पर उनकी सलाह बहुत अहम और उपयोगी होती थी।
मां के कहने पर उठाया था मंदिर आंदोलन का बीड़ा
जस्टिस देवकीनंदन के नजदीकी रिश्तेदार अभय अग्रवाल कहते हैं कि सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी मां के कहने पर मंदिर आंदोलन में सहयोग करने का निर्णय लिया था।
उन्होंने अयोध्या में सरयू के तट पर जाकर शपथ ली थी कि रामलला का मंदिर बनवाने का हर संभव प्रयास करेंगे। अशोक सिंहल से उनकी काफी घनिष्ठता थी। वह अक्सर जस्टिस देवकी नंदन से मंदिर आंदोलन को लेकर सलाह लेने आते थे।