जवाहर पंडित ने जौनपुर के छोटे गांव से निकलकर झूंसी में खड़ा किया सियासी किला
जौनपुर के एक छोटे से गांव खैरतारा से निकलकर जवाहर यादव उर्फ पंडित ने पहले तो शराब और बालू के ठेकों से दौलत और शोहरत कमाई फिर इस शोहरत की बदौलत झूंसी में सियासी किला बनाया जिसे काफी समय तक कोई भेद नहीं पाया था। ठेका, अपराध और सियासी गठजोड़ से जवाहर पंडित ने खुद को इलाहाबाद की राजनीति में मजबूती से स्थापित कर लिया था। इसी गठजोड़ की वजह से करवरिया बंधुओं से उनकी दुश्मनी हो गई थी।
जवाहर पंडित जौनपुर के खैरतारा से 1981 में झूंसी आ गए थे। अपने गांव में दबंग युवकों में शुमार जवाहर ने जल्द ही आस पास के लोगों से मेलजोल बढ़ाया और शराब के धंधे में लग गए। उस समय झूंसी में बालू के ठेकों में करवरिया बंधुओं और उनके लोगों का साम्राज्य था। दारू के ठेके से जब पैसा और शोहरत बढ़ी तो जवाहर ने बालू के ठेके में हाथ डालना शुरू कर दिया। दोनों परिवारों में अनबन की शुरुआत यहीं से हो गई थी। पंडित ने धीरे धीरे बालू के ठेकों में वर्चस्व जमाना शुरू कर दिया। 1989 के आम चुनावों से पहले जवाहर पंडित ने किसी के माध्यम से मुलायम सिंह यादव से मुलाकात कर ली।
उस मुलाकात के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे धीरे वह इलाहाबाद में मुलायम के करीबी लोगों में शुमार होते गए। मुलायम के मुख्यमंत्री बनने के बाद जवाहर पंडित ने राजनीति करने की ठान ली। धीरे धीरे उन्होंने झूंसी मेें अपनी सियासी जमीन तैयार की और पहली बार मुलायम की पार्टी से 1991 में चुनाव लड़े लेकिन महज 642 वोटों से चुनाव हार गए लेकिन खुद का सियासी रसूख स्थापित कर लिया था। उनका रसूख बढ़ते ही बालू के ठेकों में उनका दखल और बढ़ गया और दुश्मनी गाढ़ी होने लगी।
1993 में सपा बसपा गठबंधन हुआ तो जवाहर पहली बार विधायक बने। सत्ता मिली तो जवाहर पंडित का सियासी रसूख बड़ी तेजी से बढ़ने लगा। बताया जाता है कि उस समय इलाहाबाद की सपा की राजनीति दो जवाहरों के बीच घूमती थी। मुलायम सिंह जवाहर सिंह यादव की बात सुनते थे या फिर जवाहर पंडित की। हत्या से पहले तक वह जवाहर मुलायम सिंह के करीबी बने रहे। 1996 में उनकी हत्या से तीन महीने पहले ही विधान सभा भंग हो गई थी। उनकी हत्या की खबर सुनकर मुलायम सिंह खुद यहां पहुंचे थे और परिवार के लोगों को हर संभव मदद का आश्वासन दिया था। बाद में उन्होंने उनकी पत्नी विजमा को विधायकी का टिकट और वह जीती थीं।
विजमा दो बार बनीं विधायक
जवाहर पंडित की मौत के बाद उनकी सियासी विरासत उनकी पत्नी विजमा को मिली। अब तक सिर्फ घर संभाल रहीं विजमा ने जवाहर की विरासत को बखूबी संभाला और दो बार लगातार विधायक बनी। उनकी बेटी ज्योति ने पिछले बार फूलपुर से ब्लाक प्रमुख का चुनाव लड़ा था, मगर हार गई थीं।
कोर्ट के फैसले पर विजमा ने जताया संतोष, बांटी मिठाई
जवाहर यादव ऊर्फ पंडित हत्याकांड में करवरिया बंधुओं को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद पत्नी विजमा यादव तथा परिवार के अन्य सदस्यों के चेहरे पर संतोष के भाव दिखे। न्यायालय के आदेश को लेकर उनमें उत्साह था तथा मिठाइयां भी बांटी गईं लेकिन 23 वर्ष पहले हुई पति की हत्या तथा संघर्षों की चर्चा के दौरान विजमा की आंखें कई बार छलक पड़ीं। फैसले पर सपा नेता पूर्व विधायक विजमा ने कहा, 23 वर्ष बाद न्याय मिला है। सरकार ने तो मुकदमा वापस ले लिया था लेकिन न्यायालय पर पूरा भरोसा था। न्यायालय के आदेश से भरोसा और मजबूत हुआ है। यदि वे लोग (करवरिया बंधु) हाईकोर्ट गए तो वहां भी संघर्ष जारी रहेगा। न्याय के लिए जहां भी जाना पड़ेगा वहां जाएंगे।
21 नवंबर को है बेटी की शादी
जवाहर यादव की बड़ी बेटी ज्योति के लिए न्यायालय का फैसला काफी भावुक करने वाला रहा। फूलपुर की ब्लाक प्रमुख रहीं ज्योति की 21 नवंबर को शादी है। शादी तथा पूरे प्रकरण पर चर्चा छिड़ते ही वह रो पड़ती हैं। उनका कहना था, मां ने कोई कमी नहीं होने दी। पिता की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। उनका कहना था, मां तथा पूरे परिवार ने 23 वर्ष तक बहुत संघर्ष किया। ज्योति ने बताया कि वह फूलपुर की ब्लाक प्रमुख थीं। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बनने बाद 2017 में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। सत्ता के आगे उनकी नहीं चली।