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High Court : धोखाधड़ी में मंशा साबित होना जरूरी, हाईकोर्ट ने समन आदेश रद्द कर मामला फिर ट्रायल कोर्ट भेजा

Wed, 06 May 2026 07:40 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 06 May 2026 07:40 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धोखाधड़ी के अपराध को साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि शुरुआत से ही आरोपी की मंशा धोखा देने की हो। यदि ऐसा प्रारंभिक इरादा स्पष्ट नहीं है तो केवल विवाद के आधार पर धोखाधड़ी का मामला नहीं बनता।

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Intention must be proven in fraud; High Court cancels summons order and sends case back to trial court
अदालत। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धोखाधड़ी के अपराध को साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि शुरुआत से ही आरोपी की मंशा धोखा देने की हो। यदि ऐसा प्रारंभिक इरादा स्पष्ट नहीं है तो केवल विवाद के आधार पर धोखाधड़ी का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने समन आदेश रद्द करते हुए प्रकरण को पुनः विचार के लिए ट्रायल कोर्ट भेज दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने हरजीत सिंह व एक अन्य की याचिका पर दिया है।

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याची हरजीत सिंह व अन्य के खिलाफ साबिर अली उर्फ प्रिंस खान ने कानपुर के गोविंद नगर थाने में धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि वह एक ऑटो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में कार्यरत था। नौकरी के दौरान उससे वेतन के लिए चार खाली हस्ताक्षरित चेक जमा कराए गए।
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बाद में कंपनी की ओर से कथित रूप से बिना अनुमति पेट्रोल वाहनों को सीएनजी/पीएनजी में बदलने का दबाव बनाया गया। इन्कार करने पर उसे प्रताड़ित किया गया। दो अगस्त 2021 को उसने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद दिए गए चेक में से एक का दुरुपयोग कर उसके खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया गया।
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वहीं, याचियों की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता कंपनी में मैनेजर था और उसने ग्राहकों से लगभग 9.41 लाख रुपये वसूले, लेकिन जमा नहीं किए। इसके बाद दिए गए चेक के बाउंस होने पर उसके खिलाफ पहले ही एनआई एक्ट के तहत मुकदमा दायर किया जा चुका है।


कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली रेस क्लब मामले का हवाला देते हुए कहा कि समान तथ्यों पर धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी की कार्यवाही एक साथ नहीं चलाई जा सकती। कोर्ट ने समन आदेश को रद्द करते हुए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को सुनकर नए सिरे से आदेश पारित किया जाए।

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