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संगम पर आस्था, भक्ति, विश्वास की अनंत बूंदें एकाकार
Sat, 25 Jan 2020 01:31 AM IST
विनोद सिंह
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 25 Jan 2020 01:31 AM IST
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संगम के आठ किमी लंबे दायरे में बने घाटों पर शुक्रवार को मौन डुबकी में आस्था की अनंत बूंदें एकाकार हुईं। न किसी ने सूर्योदय का इंतजार किया न पुण्यकाल का। आधी रात त्रिवेणी केसुरम्य तट पर हर कोई प्रयाग में माघ महिमा पर आधारित गोस्वामी तुलसी दास की चौपाई - सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी... के भावों को आत्मसात करने की ललक लिए डुबकी मारने लगा। रेती पर न कपड़े बदलने की ठांव थी न ठिठकने की, लेकिन पुरोहितों-संतों की शंखध्वनियां,घंट-घड़ियाल के बीच आस्था, विश्वास और भक्ति की लहरें चहुंदिश हिलोरें मारती रहीं।
भक्तिभाव के सागर से निकली आस्था की अलौकिक आभा ने संगम से लेकर रेती की हर पगडंडियों और चकर्ड प्लेट वाली सड़कों तक अलौकिक छटा बिखेर दी। पौ फटते ही पूरब की लाली से फूटी किरणें संगम की लहरों पर उतर कर हर तन-मन में शक्ति और उल्लास का संचार करने लगीं। पुण्य की डुबकी लगाने के साथ ही उन्हीं लहरों पर लोक मंगल और सौभाग्य के दीप भी जलते रहे और दुग्धाभिषेक भी होता रहा। संगम नोज की सर्क्युलेटिंग एरिया में तिलक-त्रिपुंड लगाने वाले पुरोहितों के आसपास कोई जप करता रहा तो कोई ध्यान।
कहीं ढो-हारमोयिम, झांझ बजाती कीर्तन मंडलियां श्रद्धालुओं का स्वागत कर रही थीं तो कहीं महिलाओं के समूह गंगा गान कर रहे थे। अलग-अलग भाषा, पहनावा और संस्कृतियों के रंग आपस में इस तरह धकियाते, मिलते संगम की ओर बढ़ रहे थे, जैसे बाढ़ में हर तरफ से नदियां समुद्र में मिलने के लिए आतुर हुई हों। बच्चे मम्मी-पाप के कंधे पर सवार थे तो महिलाएं अपने पति या पुत्रों का हाथ थाम कर संगम में नहाने पहुंची थीं। संगम पर पुण्य रूपी कमाई को अर्जित करने के लिए ऐसा ही समागम 2500 बीघा क्षेत्रफल में बसे माघ मेले में हर तरफ नजर आया। तीन दशक बाद मकर राशि पर सूर्य के साथ शनि के आने का संयोग भी से भी संगम की बूंदों के स्पर्श की चाह हर किसी में थी।
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भक्तिभाव के सागर से निकली आस्था की अलौकिक आभा ने संगम से लेकर रेती की हर पगडंडियों और चकर्ड प्लेट वाली सड़कों तक अलौकिक छटा बिखेर दी। पौ फटते ही पूरब की लाली से फूटी किरणें संगम की लहरों पर उतर कर हर तन-मन में शक्ति और उल्लास का संचार करने लगीं। पुण्य की डुबकी लगाने के साथ ही उन्हीं लहरों पर लोक मंगल और सौभाग्य के दीप भी जलते रहे और दुग्धाभिषेक भी होता रहा। संगम नोज की सर्क्युलेटिंग एरिया में तिलक-त्रिपुंड लगाने वाले पुरोहितों के आसपास कोई जप करता रहा तो कोई ध्यान।
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कहीं ढो-हारमोयिम, झांझ बजाती कीर्तन मंडलियां श्रद्धालुओं का स्वागत कर रही थीं तो कहीं महिलाओं के समूह गंगा गान कर रहे थे। अलग-अलग भाषा, पहनावा और संस्कृतियों के रंग आपस में इस तरह धकियाते, मिलते संगम की ओर बढ़ रहे थे, जैसे बाढ़ में हर तरफ से नदियां समुद्र में मिलने के लिए आतुर हुई हों। बच्चे मम्मी-पाप के कंधे पर सवार थे तो महिलाएं अपने पति या पुत्रों का हाथ थाम कर संगम में नहाने पहुंची थीं। संगम पर पुण्य रूपी कमाई को अर्जित करने के लिए ऐसा ही समागम 2500 बीघा क्षेत्रफल में बसे माघ मेले में हर तरफ नजर आया। तीन दशक बाद मकर राशि पर सूर्य के साथ शनि के आने का संयोग भी से भी संगम की बूंदों के स्पर्श की चाह हर किसी में थी।
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