Mahakumbh : 1797 के हरिद्वार कुंभ में राजसी स्नान के लिए नागाओं-बैरागी संतों के बीच हुआ था भीषण युद्ध
महाकुंभ की संस्कृति, बसावट, स्नान पर्व और भीड़ को लेकर गजेटियर में भी वर्णन मिलता है। अंग्रेज सैन्य अफसर कैप्टन टाॅम हार्डविक ने अपने एक लेख में हरिद्वार के 1797 के कुंभ की घटना पर विस्तार से रोशनी डाली है। कैप्टन हार्डविक ने लिखा है कि उस कुंभ में हरिद्वार में हर की पैड़ी पर देश भर से साधु-संन्यासी पहुंचे।
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कुंभ में राजसी स्नान के लिए अलग-अलग परंपरा के संतों के बीच युद्ध भी होते रहे हैं। 1797 के हरिद्वार कुंभ में नागा संन्यासियों और वैरागी परंपरा के संतों में भीषण युद्ध हुआ था। इस कुंभ में 20 लाख संतों-भक्तों के डुबकी लगाने का उल्लेख मिलता है।
महाकुंभ की संस्कृति, बसावट, स्नान पर्व और भीड़ को लेकर गजेटियर में भी वर्णन मिलता है। अंग्रेज सैन्य अफसर कैप्टन टाॅम हार्डविक ने अपने एक लेख में हरिद्वार के 1797 के कुंभ की घटना पर विस्तार से रोशनी डाली है। कैप्टन हार्डविक ने लिखा है कि उस कुंभ में हरिद्वार में हर की पैड़ी पर देश भर से साधु-संन्यासी पहुंचे। संतों के साथ ही डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ भी काफी बढ़ गई थी। हार्डविक ने तब के कुंभ में 20 लाख श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने की बात लिखी है।
वह लिखते हैं कि शक्ति में प्रथम स्थान रखने वाले नागाओं ने सबसे पहले राजसी स्नान का एलान किया। इतना ही नहीं स्नान के समय तलवार, भाला समेत अन्य शस्त्र लेकर कुंभ क्षेत्र में प्रवेश न करने का आज्ञा पत्र भी जारी किया। नागाओं ने पूरे मेला क्षेत्र पर अपना नियंत्रण कर लिया। बैरागी परंपरा के संत राजसी स्नान करना चाहते थे, लेकिन नागाओं ने उनको रोक दिया। नागा-संन्यासी तलवार-ढाल के साथ चल रहे थे और आम जनता के हाथों में सिर्फ लाठी रहती थी।
पुलिस भी थी नागाओं के अधीन
मेले के समय तक पुलिस भी नागाओं के ही अधीन रहती थी। संन्यासी ही अपने धूने पर लोगों की शिकायतें सुनते और निपटारा करते थे। हार्डविक ने लिखा है कि 10 अप्रैल की सुबह मेला समाप्त हुआ। विदाई होने के साथ ही सुबह बैरागी संतों ने सिखों के साथ मिलकर सभी घाटों पर नागा साधुओं पर हमला कर दिया। उस हमले के समय ब्रिटिश फौज मूकदर्शक बनी रही।