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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   In Sirsa, Acharya Kripalani had opposed Nehru's referendum policy on Kashmir for the first time.

Chunav : सिरसा में आचार्य कृपलानी ने कश्मीर पर नेहरू की जनमत संग्रह नीति का पहली बार किया था विरोध

Sat, 30 Mar 2024 04:32 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 30 Mar 2024 04:32 PM IST
सार

आचार्य कृपलानी 1957 में इलाहाबाद आए थे। मेजा के पास सिरसा में चुनावी सभा में कश्मीर पर जनमत संग्रह का मुखर विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि कश्मीर का प्रश्न अकेले कांग्रेस का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। सिरसा में कृपलानी को सुनने के लिए हजारों की तादाद में भीड़ जुटी थी।

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In Sirsa, Acharya Kripalani had opposed Nehru's referendum policy on Kashmir for the first time.
आचार्य कृपलानी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

किसान मजदूर प्रजा पार्टी के अध्यक्ष रहे प्रखर समाजवादी चिंतक आचार्य जेबी कृपलानी कश्मीर मुद्दे पर पं.जवाहर लाल नेहरू की नीतियों के विरोध में खड़े रहे। कई मुद्दों पर कांग्रेस से असहमत होने की वजह से ही 1951 में उन्होंने अलग होकर किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई थी। उस दौरान सिरसा में एक चुनावी सभा में आचार्य कृपलानी ने पहली बार कश्मीर पर नेहरू की जनमत संग्रह कराने की नीति का विरोध किया था।

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आचार्य कृपलानी 1957 में इलाहाबाद आए थे। मेजा के पास सिरसा में चुनावी सभा में कश्मीर पर जनमत संग्रह का मुखर विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि कश्मीर का प्रश्न अकेले कांग्रेस का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। सिरसा में कृपलानी को सुनने के लिए हजारों की तादाद में भीड़ जुटी थी। तब उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की ओर से गलत प्रचार किया जा रहा है कि कांग्रेस के विरुद्ध वोट देना सरकार की कश्मीर नीति के विरोध में वोट देना है। तब आचार्य ने कश्मीर के मुद्दे को सुरक्षा परिषद में ले जाने की सरकार की नीति का भी विरोध किया था।
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इससे बाद नेहरू से कृपलानी का वैचारिक टकराव बढ़ता गया। कश्मीर मुद्दे के साथ ही राष्ट्र निर्माण से जुड़े कई मसलों पर कृपलानी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। 13अगस्त 1963 को आचार्य कृपलानी ने नेहरू की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था। 19अगस्त 1963 को इस पर चर्चा शुरू करते हुए आचार्य कृपलानी ने कहा था कि मेरे लिए यह बेहद दुख की बात है कि मुझे एक ऐसी सरकार के खिलाफ़ प्रस्ताव लाना पड़ा है, जिसे मेरे ही कई पुराने मित्र चला रहे हैं। इनमें कुछ तो मेरे 30 साल से ज्यादा पुराने मित्र हैं, लेकिन कर्तव्य की मांग थी। इसलिए इस पर भावुक होने का सवाल नहीं उठता।

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