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प्रयागराज में मजदूरों ने बयां किया दर्द, दुआ है कि देहरी पर पहुंचकर ही निकले दम

Thu, 21 May 2020 01:18 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 21 May 2020 01:18 AM IST
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In Prayagraj, the laborers told what is the pain, wish that only after reaching Dehri came out
prayagraj news - फोटो : prayagraj

प्रवासी मजदूरों की अंतहीन मुसीबतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। लॉकडाउन ने पहले से बेपर्दा जिंदगी को और चिथड़ा-चिथड़ा करके रख दिया है। लॉकडाउन के साथ शुरू हुई मजदूरों की बेबसी की कहानी इसके बढ़ने के साथ ही और बढ़ती जा रही हैं।

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घर की चौखट को चूमने की आस में पांव के छालों की परवाह किए बिना तपती दोपहरी में भी बस आगे ही बढ़ते जाने का सिलसिला जारी है। हफ्ते भर में एक या दो बार खाना नसीब हुआ, बाकी का सफर बिस्किट और खीरा खाकर ही पूरा कर रहे हैं। जांचें जाने कितनी बार हुईं लेकिन किसी ने न खाने को पूछा न पानी।

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In Prayagraj, the laborers told what is the pain, wish that only after reaching Dehri came out
prayagraj news - फोटो : prayagraj

मुसीबत के इस सफर में सबसे बुरा हाल प्रवासी मजदूरों के बच्चों का है। मुस्तफाबाद, उन्नाव के रहने वाले विजय हैदराबाद में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन में काम धंधा बंद होने के बाद पास रखे थोड़े से पैसे कुछ दिन चले, फिर रोटी के लाले पड़ गए। ऐसे में डेढ़ बरस के बच्चे बुग्गे और पत्नी दिलराइन तथा भाई शुभम को लेकर घर के लिए निकल पड़े। कई किलोमीटर पैदल ही चलने के बाद चिरौरी-मिन्नत करने पर पहले से ही मजदूरों को लादे एक ट्रक वाले ने भूसे की तरह भर लिया। साथ ही भाड़े के तौर पर पांच-पांच सौ रुपये भी वसूले।

In Prayagraj, the laborers told what is the pain, wish that only after reaching Dehri came out
prayagraj news - फोटो : prayagraj

‘अमर उजाला’ से दिक्कतें साझा करते हुए दिलराइन बोली, घर से बच्चे के लिए एक बोतल में दूध लेकर निकले थे जो रात तक खत्म हो गया। ट्रक में बैठे-बैठे रास्ते में बच्चा रोया तो एक-दो ढक्कन पानी पिलाकर जैसेतैसे चुप करा दिया।

पास रखे पैसे भी खर्च हो गए हैं। क्या करते, वहां रोजी रोटी छिन गई तो घर को लौट पड़े। यहां स्कूल में सुबह दस बजे से ही लाइन लगाए हैं। कहा है शाम तक बस मिलेगी। अपनी नहीं बच्चे की चिंता है साहब, सोचा था यहां दूध मिल जाएगा नहीं मिला। भाई शुभम ने कहा, यूपी में दाखिल होेने के बाद कई जगह जांच हुई लेकिन कहीं पानी तक नहीं मिला।

सिविल लाइंस में बस की बाट जोह रहे मुंबई से लौटे कैसरगंज, बहराइच के मोहम्मद आलम बोले, साहब वहां कार चलाते थे। काम बंद हुआ तो पैसे भी खत्म हो गए। सो वतन जा रहे हैं। खुदा ने चाहा तो अम्मी-अब्बू का चेहरा ही देख लेंगे, ईद हो जाएगी। बस, दुआ है कि दम निकलने से पहले देहरी पर पहुंच जाएं।

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In Prayagraj, the laborers told what is the pain, wish that only after reaching Dehri came out
prayagraj news - फोटो : prayagraj
मुंबई में ही मिठाई के एक कारखाने में काम करने वाले कुंडा, दिलेरगंज के आशीष कुमार निर्मल, वीरेंद्र कुमार बोले, साहब न खोली का किराया देने और न ही खाने को बचा था। दिन में चिरौरी करके कोई ट्रक वगैरह में चढ़ लेते और रात में पैदल की चलते रहे। कई घंटे से खड़े हैं, कोई बस नहीं है, अब यहां से भी पैदल ही कुंडा तक जाना पड़ेगा। कभी कुछ देर के लिए कोई साधन मिल गया लेकिन ज्यादा सफर हम पैदल ही चलते रहे।

मुंबई से ही साथ में लौटे राजेंद्र कुमार वहां कपडे प्रेस करने का काम करते थे, लॉकडाउन के साथ काम बंद हो गया। कभी आधी पेट, कभी एक वक्त तो कभी भूखे भी सोना पड़ा सो घर की राह थाम ली। हिम्मत जवाब दे गई है लेकिन घर पहुंचने से पहले पांव नहीं थमने वाले हैं। बहुत भूख लगती है तो पानी पी लेते हैं। 

थककर चूर हैं, हम मजदूर हैं

यह व्यथा है हैदराबाद से अपने घर करारी, कौशाम्बी लौटने वाले मजदूरों की। हैदराबाद की चंदूलाल बारादरी की एक साड़ी फैक्ट्री में काम करने वाले मोहम्मद इसहाक और मोहम्मद यूसुफ के  चेहरे पर थकान इस कदर थी कि उनके मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी।

डीएसए मैदान के सामने बने पुल पर ‘अमर उजाला’ से अपनी मुसीबतें साझा करते हुए युसूफ ने कहा, लॉकडाउन के साथ ही काम बंद। बचे पैसे चंद रोज में खत्म हो गए। हैदराबाद ने अपनी सीमा तक बस से भेज दिया था। थोड़ी दूर ट्रक का सहारा रहा। बीते तीन दिनों से पैदल चलते-चलते थककर चूर हो गए हैं, खाने को भी कुछ नहीं मिला। खुदा जाने घर तक पहुंचना नसीब होगा कि नहीं।
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