High Court : घटना का मूल कारण अगर ट्रांसजेंडर की पेशागत प्रतिद्वंद्विता तो लागू नहीं होगा एससी/एसटी एक्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि घटना का मूल कारण ट्रांसजेंडर की पेशागत प्रतिद्वंद्विता हो और जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का आरोप न हो तो एससी/एसटी एक्ट की धारा लागू नहीं होगी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि घटना का मूल कारण ट्रांसजेंडर की पेशागत प्रतिद्वंद्विता हो और जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का आरोप न हो तो एससी/एसटी एक्ट की धारा लागू नहीं होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम की एकलपीठ ने उन्मोचन प्रार्थनापत्र पर सुनवाई करते हुए दिया। आरोपियों के खिलाफ मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर थाने में मारपीट और एससी/एसटी एक्ट समेत अन्य गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज हुई थी। इसपर मुजफ्फरनगर के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) के कोर्ट में जमानत अर्जी दायर की गई थी। कोर्ट ने पांच अगस्त 2025 को जमानत अर्जी खारिज कर दी। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि घटना के दौरान किसी भी प्रकार के जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का आरोप नहीं है और न ही यह दर्शाया गया है कि कथित घटना केवल इस कारण हुई कि वादी अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय से है। दोनों पक्ष ट्रांसजेंडर हैं और पारंपरिक पेशागत गतिविधियों में संलग्न हैं।
क्षेत्र में प्रवेश को लेकर उत्पन्न विवाद को आपसी पेशागत प्रतिद्वंद्विता का परिणाम बताया। साथ ही याची के गुरु ने पुलिस को दिए बयान में कहा था कि किसी ट्रांसजेंडर के समूह में शामिल होने के बाद उसकी पूर्व जाति का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने पांच अगस्त 2025 के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए एससी/एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोप को समाप्त कर दिया। साथ ही आरोपियों के उन्मोचन प्रार्थनापत्र को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में दर्ज अन्य धाराओं में विधि के अनुसार आगे की कार्यवाही जारी रहेगी।