हिंदी हैं हम : संगमनगरी से नाटकों के जरिए सात समंदर पार पहुंची हिंदी
प्रयागराज हिंदी नाट्य आंदोलन का पुराना गढ़ रहा है। आजादी के पहले ही अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए रामलीला, रासलीला और नाट्य दल, नौटंकी जैसी प्रदर्शनकारी कलाएं हिंदी को जन प्रिय बनाने का माध्यम बन गईं।
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संगमनगरी से नाटकों के जरिए हिंदी देश के कोने-कोने से होकर सात समंदर पार तक पहुंची है। हिंदी नाट्य आंदोलन का केंद्र रहे इस शहर ने कई ऐसे नाटक दिए, जो देश ही नहीं दुनिया भर में मंचित किए गए। इसमें धर्मवीर भारती के अंधायुग और एकांकी सम्राट डॉ राम कुमार वर्मा के नाटक ध्रुवस्वामिनी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिल चुकी है। खास बात यह है कि इंग्लैंड से लेकर जापान तक ये नाटक हिंदी में ही मंचित किए गए।
प्रयागराज हिंदी नाट्य आंदोलन का पुराना गढ़ रहा है। आजादी के पहले ही अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए रामलीला, रासलीला और नाट्य दल, नौटंकी जैसी प्रदर्शनकारी कलाएं हिंदी को जन प्रिय बनाने का माध्यम बन गईं। इसमें प्रयागराज के साहित्यकार माधव शुक्ल, कृष्ण देव उपाध्याय के योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। माधव शुक्ल ने 1898 सीय स्वयंबर, 1916 महाभारत पूर्वाध और भामाशाह की राजभक्ति नामक नाटकों की रचना कर हिंदी आंदोलन को गति प्रदान की। लोक नाट्यविद अतुल यदुवंशी बताते हैं कि उस दौर में ये सभी नाटक सफलता के साथ खेले गए थे और तब माधव शुक्ल ने भी उन मंचनों में अभिनय किया था।
इतना ही नहीं इसमें कई विदेशी रंगकर्मियों ने भी अभिनय किया। डॉ राम कुमार वर्मा की पुत्री राजलक्ष्मी वर्मा बताती हैं कि तव वह बहुत छोटी थीं, जब पिता जी के नाटक ध्रुव स्वामिनी को जापान के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। जापान में ही उनके नाटक औरंगजेब की आखिरी रात का मंचन किया गया था। इसी तरह उपेंद्र नाथ अश्क के नाटक परदा उठाओ परदा गिराओ का भी मंचन इंग्लैंड में किया जा चुका है। इनके अलावा कहानीकार दूधनाथ सिंह के नाटक यमगाथा को भी देश भर में मंचित किया गया ।