फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   highcourt order

ज्योतिष्पीठ विवाद पर हाईकोर्ट ने निर्णय सुरक्षित किया

Wed, 04 Jan 2017 12:22 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद Updated Wed, 04 Jan 2017 12:22 AM IST
विज्ञापन
highcourt order
other
ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य की गद्दी को लेकर चल रहे कानूनी विवाद पर हाईकोर्ट ने मंगलवार को अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है। सिविल कोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल अपील पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति केजे ठाकर की पीठ ने सुनवाई की। ज्योतिष्पीठ की दावेदारी को लेकर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद आमने-सामने हैं। सिविल कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद के पक्ष में निर्णय दिया है। उनको वास्तविक शंकराचार्य और ज्योतिष्पीठ का असली दावेदार करार दिया है। इस फैसले के खिलाफ वासुदेवानंद ने कोर्ट में अपील दाखिल की है। मामला सुप्रीमकोर्ट तक भी गया मगर सर्वोच्च अदालत ने सिविल कोर्ट के फैसले पर स्थगन आदेश जारी करने के बजाए इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में करने का आदेश दिया था।
विज्ञापन


दोनों पक्षों के बीच महीनों चली बहस के दौरान वासुदेवानंद के अधिवक्ता मनीष गोयल ने दलील दी कि वासुदेवानंद ब्राह्मण हैं और दंडी सन्यासी हैं। उनको मनीषियों ने शंकराचार्य की गद्दी पर स्थापित किया है। वह इस पद की सभी योग्यताएं रखते हैं। यह भी तर्क दिया गया कि आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित पुस्तक ‘महाम्नाय महानुशासनम्’ में शंकराचार्य होने के लिए वर्णित सभी योग्यताएं स्वामी वासुदेवानंद रखते हैं। उनको गुरु-शिष्य परंपरा के तहत शंकराचार्य की गद्दी पर सर्वाधिक योग्य होने के कारण स्थापित किया गया है।
विज्ञापन


दूसरी ओर शंकराचार्य स्वरूपानंद के अधिवक्ता शशिनंदन और अनूप त्रिवेदी ने कहा कि आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित पुस्तक ‘महाम्नाय महानुशासनम्’ के अनुसार वासुदेवानंद शंकराचार्य होने की योग्यता नहीं रखते हैं। पुस्तक के अनुसार शंकराचार्य पद धारण करने वाले व्यक्ति को ब्रह्मचारी, ब्राह्मण, वेद-वेदांग का ज्ञाता और निरोगी होना चाहिए। वासुदेवानंद को चर्म रोग है, वह गृहस्थ रहे हैं और शंकराचार्य बनाए जाने से पूर्व नौकरी करते थे। उनको मनीषियों द्वारा इस पद पर कभी स्थापित नहीं किया गया। संन्यास लेने के बाद भी वह बकायदा शिक्षक के रूप में काम कर वेतन लेते रहे हैं। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक टीचर सन्यासी कैसे हो सकता है और यदि ऐसा था तो वह शंकराचार्य कैसे बन सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

बता दें कि पांच मई 2015 को सिविल कोर्ट ने शंकराचार्य की गद्दी पर फैसला सुनाते हुए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को असली शंकराचार्य करार दिया है तथा वासुदेवानंद को शंकराचार्य की पदवी, छत्र, चंवर और दंड धारण करने से रोक दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed