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हाईकोर्ट का फैसला: हत्या के जुर्म में 14 साल से सजा काट रहे व्यक्ति को किया रिहा, सबूत की कमी

Sat, 06 Mar 2021 10:54 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 06 Mar 2021 10:54 AM IST
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High court verdict: Three accused serving life imprisonment for murder
allahabad high court - फोटो : social media

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा पाए तीन अभियुक्तों की सजा रद्द कर उनको बरी करने का आदेश दिया है। इनमें से एक अभियुक्त ने लगभग 14 साल जेल में बिताए हैं जबकि दो अपील लंबित रहने के दौरान जमानत पर थे। सजा रद्द करने का आदेश देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा है। अभियुक्तों के खिलाफ न तो ठोस सबूत पेश किए गए और न ही चश्मदीद गवाह का बयान संदेह रहित साबित हो सका है। 

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कोर्ट ने कहा कि घटना के समय चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी संदेहास्पद है। सत्र न्यायालय ने साक्ष्यों को समझने में गलती की है। यह फैसला न्यायमूर्ति मनोज मिश्र तथा न्यायमूर्ति एसके पचौरी की खंडपीठ ने मुकेश तिवारी, इंद्रजीत मिश्र व संजीत मिश्र की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। अभियोजन पक्ष का कहना था कि 30 जुलाई 2007 को तड़के करीब दो बजे प्रताप शंकर मिश्र व उनकी पत्नी मनोरमा देवी घर पर कमरे में सोये थे। मनोरमा के दो भाई बाहर बरामदे में सो रहे थे। पत्नी मनोरमा देवी ने कहा कि आरोपी हॉकी ,चाकू व पिस्टल लेकर कमरे में घुस आए और हमला कर दिया। गोली मुकेश ने मारी जबकि इंद्रजीत और संजीत ने प्रताप को पकड़ रखा था।

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High court verdict: Three accused serving life imprisonment for murder
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

कोर्ट ने कहा मेडिकल रिपोर्ट में शरीर पर हॉकी की चोट के निशान नहीं है। गोली गले में लगी है। पत्नी सहित अन्य चश्मदीद के कपड़ों पर खून नहीं है। हमलावर शोर सुन बाउंड्री कूदकर भाग गए। किसी ने पकड़ने की कोशिश नहीं की और बाउंड्री कूद कर भागते भी किसी ने नहीं देखा। इससे लगता है घटना के बाद चश्मदीद वहां पहुंचे। घायल को गाड़ी से थाना रेवती ले गए।

मजरूबी चिट्ठी लिखी गई। मजरूबी चिट्ठी कब किसने लिखी स्पष्ट नहीं। केवल साथ गए चश्मदीद के हस्ताक्षर सही पाए गए। फिर घायल को बलिया सदर अस्पताल ले गए जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। पत्नी के अलावा अन्य चश्मदीद गवाहों को कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। आरोपियों से दुश्मनी के कारण चार्जशीट दाखिल की गई। किंतु तमंचे से फायर करने के आरोपी मुकेश का कोई संबंध ही नहीं था।

High court verdict: Three accused serving life imprisonment for murder
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
कोर्ट ने कहा प्राथमिकी देरी से दर्ज हुई। जबकि पीड़ित दो बार थाने गए। अस्पताल जाते समय व अस्पताल से लौटते समय एफआईआर दर्ज करा सकते थे। मजरूबी चिट्ठी लिखे जाने का दिन, समय स्पष्ट नहीं है। बयान विरोधाभाषी है। आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत नहीं है। हत्या की काल्पनिक कहानी गढ़ी गई।

 कोर्ट ने कहा कि घटना की कई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। हो सकता है मृतक प्रताप शंकर मिश्र बरामदे में चारपाई पर सोए हो और घायल होने पर कमरे की तरफ भागे हों और कमरे में खून गिरा हो। दोनो भाई आंगन के बरामदे में सो रहे थे या सहन के बरामदे में ,स्पष्ट नहीं है। हो सकता है वे बाद में आए हों। पत्नी व भाई के कपड़े पर खून न होने से लगता है चश्मदीदों ने घायल को छुआ तक नहीं। विचारण न्यायालय ने इन तमाम बिंदुओं पर विचार ही नहीं किया और सजा सुना दी। कोर्ट ने सत्र न्यायालय की सजा रद्द कर दी है।
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