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High Court : फरार घोषित आरोपी की गैरहाजिरी में भी चलेगा मुकदमा, कोर्ट सुना सकता है फैसला

Thu, 07 May 2026 01:50 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 07 May 2026 01:50 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई आरोपी पुलिस और अदालत से बचने के लिए लगातार फरार रहता है तो कानूनन यह मान लिया जाएगा कि उसने मुकदमे में उपस्थित रहने का अपना अधिकार त्याग दिया है।

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High Court trial will continue even in the absence of the accused declared absconding
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई आरोपी पुलिस और अदालत से बचने के लिए लगातार फरार रहता है तो कानूनन यह मान लिया जाएगा कि उसने मुकदमे में उपस्थित रहने का अपना अधिकार त्याग दिया है। ऐसी स्थिति में अदालत उसकी गैरहाजिरी में भी मुकदमे की सुनवाई जारी रख सकती है और मामले में अंतिम फैसला व सजा भी सुना सकती है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने आगरा निवासी रवि उर्फ रविंद्र सिंह की याचिका को खारिज करते हुए दिया है। हत्या के प्रयास के मामले में जमानत मिलने के बाद याची दो वर्षों से फरार था। उसके खिलाफ कई बार गैर जमानती वारंट जारी हो चुका था।
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हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोपियों के कारण मुकदमों की कार्यवाही अंतहीन समय तक लंबित नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 356 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए यूपी के गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक, अभियोजन निदेशालय और सभी जिलाधिकारियों को दिशानिर्देश जारी किए हैं।

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High Court trial will continue even in the absence of the accused declared absconding
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

हाईकोर्ट की ओर से स्पष्ट किए गए नियमों के अनुसार फरार आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमा शुरू करने से पहले आरोपी की गिरफ्तारी के लिए कम से कम 30 दिन के अंतर पर दो बार गैर जमानती वारंट जारी किए जाने चाहिए। इसके बाद उसके अंतिम ज्ञात पते वाले क्षेत्र में समाचार पत्र में एक नोटिस प्रकाशित करना होगा।

इसके बाद भी वह पेश नहीं होता है तो चार्ज फ्रेम होने की तारीख से 90 दिन बीत जाने के बाद उसकी गैरहाजिरी में मुकदमा शुरू किया जा सकता है। इस विशेष सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिकारों के संरक्षण के नियम भी बताए गए।

यदि फरार घोषित आरोपी का अपना कोई निजी वकील नहीं है तो अदालत को राज्य के सरकारी खर्च पर उसके बचाव के लिए एक वकील नियुक्त करना होगा। गवाहों के बयानों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकाॅर्ड किया जाएगा। इस पूरी व्यवस्था को लागू करने में लापरवाही पर अधिकारियों के खिलाफ गंभीर विभागीय कार्रवाई व अवमानना का मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

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