हाईकोर्ट ने कहा : बिना काम वेतन देने पर राजकीय खजाने का होगा नुकसान, पूर्व कर्मचारी की याचिका खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धांत में छूट देने से याची को अनुचित लाभ होगा और राज्य के खजाने का नुकसान होगा। याची भ्रष्टाचार के मामले में तीन साल जेल में रहा, इस अवधि का वेतन मांगने का उसे कोई वैध अधिकार नहीं है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धांत में छूट देने से याची को अनुचित लाभ होगा और राज्य के खजाने का नुकसान होगा। याची भ्रष्टाचार के मामले में तीन साल जेल में रहा, इस अवधि का वेतन मांगने का उसे कोई वैध अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति अजय भनोट की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए शिवाकर सिंह की याचिका खारिज कर दी।
हाथरस निवासी याची बिजली विभाग में कार्यरत थे। इस दौरान एक उपभोक्ता ने कनेक्शन के लिए रिश्वत मांगने का आरोप लगाते हुए शिकायत की। इसपर भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के पुलिस अधीक्षक ने उनपर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया। इसके चलते उन्हें 23 जनवरी 2015 से 18 दिसंबर 2018 तक लगभग तीन साल के लिए जेल में रहना पड़ा। जेल अवधि का वेतन विभाग ने ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत पर देने से इन्कार कर दिया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
न्यायालय ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि केवल दुर्लभ मामलों में ही काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत अपवादित किया जाता है। जैसे की कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी को काम करने से रोकता है। इस मामले में नियोक्ता ने कर्मचारी को काम करने से न रोका है और न ही आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया है। ऐसे में काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धांत में छूट दी जाती है तो राज्य के खजाने का बेवजह नुकसान होगा। न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।