High Court : अदालत में जाली दस्तावेज पेश करना न्यायिक पवित्रता पर हमला, आय छिपाने पर पति की याचिका खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत में जाली दस्तावेज पेश करना न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर हमला है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की अदालत ने गौतमबुद्ध नगर निवासी गौतम मेहता की याचिका रद्द कर दी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत में जाली दस्तावेज पेश करना न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर हमला है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की अदालत ने गौतमबुद्ध नगर निवासी गौतम मेहता की याचिका रद्द कर दी। उन पर बेटे के भरण-पोषण से जुड़े मुकदमे में वास्तविक आय छिपाने के लिए बैंक के गलत विवरण को पेश करने का आरोप है। ट्रायल कोर्ट ने समन जारी किया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि अदालत में पेश बैंक के दस्तावेज संक्षिप्त विवरण थे। अदालत के आदेशानुसार भरण-पोषण की पूरी रकम अदा की गई है। लिहाजा, यह कार्यवाही अवैधानिक और अव्यावहारिक है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट में याची की ओर से पेश बैंक खाते का ब्योरा और विवेचक की ओर से पेश विवरणों की विस्तृत तुलना की। पाया कि याची के दस्तावेज में 18,000 से लेकर 200,000 रुपये तक की निकासी और जमा की विशिष्ट प्रविष्टियां कई बार गायब थीं। लिहाजा, कोर्ट ने माना कि याची का दस्तावेज अदालत की गुमराह करने वाला है।
यह है मामला
2007 में तलाक के बाद याची की पूर्व पत्नी ने नाबालिग बेटे के लिए भरण-पोषण का दावा परिवार न्यायालय में दाखिल किया। कोर्ट ने फरवरी 2019 में पति को आयकर रिटर्न, बैंक स्टेटमेंट, एफडी, बॉन्ड और वेतन पर्ची सहित पूर्ण आर्थिक ब्योरा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने 2011–2014 के आईसीआईसीआई बैंक खाते का जो ब्योरा पेश किया, वह न तो प्रमाणित था और न ही उस पर बैंक की मुहर या हस्ताक्षर थे। विवेचना में पता चला कि अदालत में दाखिल दस्तावेज से कई एंट्री जानबूझकर हटाई गई थीं, ताकि वास्तविक आय छिपाई जा सके। इस आधार पर याची के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और विवेचना के बाद पुलिस ने सितंबर 2019 में आरोप पत्र दाखिल किया था। इस पर अदालत ने संज्ञान लेते हुए याची के खिलाफ समन आदेश जारी किया।