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हाईकोर्ट : चयन के 23 साल बाद मिला नियुक्ति का आदेश, 1998 की पुलिस भर्ती में चयनित को नियुक्ति देने का निर्देश
Thu, 18 Nov 2021 09:42 PM IST
विनोद सिंह
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 18 Nov 2021 09:42 PM IST
सार
एसपी कार्मिक इंचार्ज डीआईजी स्थापना उप्र ने सत्यापन हलफनामे में तथ्य छिपाने के कारण नियुक्ति देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट के पुनर्विचार के आदेश के बाद भी नियुक्ति नहीं दी गई तो कोर्ट ने कहा कि भर्ती के 23 साल बाद विभाग को विचार करने का आदेश देना उचित नहीं है।
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- फोटो : social media
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1998 की पुलिस भर्ती में चयनित मुरादाबाद के कृष्ण कुमार को 23 साल बाद सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि याची फिट न पाया जाए तो उसे कार्यालय में नियुक्त किया जाए।
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एसपी कार्मिक इंचार्ज डीआईजी स्थापना उप्र ने सत्यापन हलफनामे में तथ्य छिपाने के कारण नियुक्ति देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट के पुनर्विचार के आदेश के बाद भी नियुक्ति नहीं दी गई तो कोर्ट ने कहा कि भर्ती के 23 साल बाद विभाग को विचार करने का आदेश देना उचित नहीं है। इसलिए कहा कि याची को बहाल किया जाए। किंतु वह बकाये वेतन का हकदार नहीं होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव ने कृष्ण कुमार की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
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याची 1998 पुलिस भर्ती में चयनित किया गया। उसके खिलाफ 1991 में आपराधिक केस दर्ज हुआ था। जिसमें वह 1999 में बरी हो चुका है। इसकी जानकारी छिपाने के कारण नियुक्ति देने से इंकार कर दिया गया। जिसे चुनौती दी तो कोर्ट ने आदेश रद्द कर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। गलत जानकारी देने पर धोखाधड़ी का केस दर्ज हुआ। जिसके आधार पर नियुक्ति नहीं दी गई। 4 अगस्त 17 के इस आदेश को चुनौती दी गई।
कोर्ट ने कहा कि जब हाईकोर्ट ने जानकारी छिपाने पर नियुक्ति से इंकार के आदेश को रद्द कर पुनर्विचार का निर्देश दिया तो उसी आधार पर दुबारा नियुक्ति देने से इंकार करना सही नहीं है। याची आपराधिक केस में बरी हो चुका है तो धोखाधड़ी के केस का कोई मायने नहीं है। कोर्ट ने कहा कि 23 साल बाद विभाग को निर्देश देना उचित रहेगा और याची को कांस्टेबल पद पर पुलिस में या कार्यालय में तैनात करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने कहा कि जब हाईकोर्ट ने जानकारी छिपाने पर नियुक्ति से इंकार के आदेश को रद्द कर पुनर्विचार का निर्देश दिया तो उसी आधार पर दुबारा नियुक्ति देने से इंकार करना सही नहीं है। याची आपराधिक केस में बरी हो चुका है तो धोखाधड़ी के केस का कोई मायने नहीं है। कोर्ट ने कहा कि 23 साल बाद विभाग को निर्देश देना उचित रहेगा और याची को कांस्टेबल पद पर पुलिस में या कार्यालय में तैनात करने का निर्देश दिया है।