हाईकोर्ट का आदेश : माघ मेले के लिए रोजाना छोड़ा जाए 3700 क्यूसेक पानी
सुनीता शर्मा की याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अजीत कुमार तीन जजों की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के पूर्व के आदेश पर प्रयागराज विकास प्राधिकरण की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने प्राधिकरण के उपाध्यक्ष का व्यक्तिगत हलफनामा कोर्ट के समक्ष रखा।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
गंगा प्रदूषण के मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि माघ मेला में आने वाले श्रद्धालुओं के स्नान के लिए पर्याप्त मात्रा में रोजाना पानी छोड़ा जाए। हाईकोर्ट ने रोजाना 3700 क्यूसेक पानी छोड़ने के लिए कहा है। इसके साथ ही काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से गंगा में बहाए गए मलबे के मामले में व्यक्तिगत हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। साथ ही गंगा की सफाई के लिए लगे एसटीपी के बकाए बिलों के संबंध में भी राज्य सरकार से जानकारी मांगी है।
सुनीता शर्मा की याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अजीत कुमार तीन जजों की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के पूर्व के आदेश पर प्रयागराज विकास प्राधिकरण की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने प्राधिकरण के उपाध्यक्ष का व्यक्तिगत हलफनामा कोर्ट के समक्ष रखा।
कोर्ट ने इसे रिकार्ड पर ले लिया। बताया गया कि गंगा के किनारे पांच सौ मीटर के दायरे में शहर में एक हजार से अधिक अवैध रूप से बनाए गए आवासीय मकान चिह्नित किए गए हैं। यह मकान शहर के अलग-अलग इलाकों में बनाए गए हैं। अवैध मकानों के चिह्निकरण की कार्रवाई अभी जारी है।
16 नालों में लगाया गया है ट्रीटमेंट प्लांट
याची के अधिवक्ता विजय चंद्र श्रीवास्तव, अधिवक्ता ताहिर हुसैन ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया। कोर्ट को बताया कि शहर में 16 नालों के पानी के शुद्धिकरण के लिए लगाए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। कई प्लांट बंद हैं तो कई काम नहीं कर रहे हैं। हलफनामे में इन नालों में शहर के कितने मोहल्लों का पानी जा रहा है, इसकी भी जानकारी दी गई है।
बताया कि 60 नालों के पानी की बॉयोरेमिडेशन विधि से शुद्धिकरण करने की व्यवस्था बनाई गई है लेकिन यह व्यवस्था भी कारगर नहीं है। अधिवक्ताओं ने बताया कि उन्होंने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और बॉयोरेमिडेशन स्थानों का टीम बनाकर दौरा किया और उन स्थानों पर 150 बोतलों में पानी लेकर जांच के लिए नगर निगम को सौंप दिया है। इसमें ट्रीटमेंट प्लांटों में पहुंचने वाले पानी और वहां से शुद्धीकरण होने के बाद गंगा में प्रवाहित होने वाली पानी के नमूने लिए गए हैं। जांच के बाद शुद्धता का पता चल सकेगा।
ट्रीटमेंट प्लांट के बिलों का मांगा ब्यौरा
कोर्ट न्रे ट्रीटमेंट प्लांट पर हो रही बिजली खपत के बिलों का विवरण भी मांगा। पूछा कि ट्रीटमेंट प्लांटों का संचालन कौन कर रहा है। इसकी निगरानी कौन कर रहा है। बताया गया कि ट्रीटमेंट प्लांट पर नालों के ेपानी के शुद्धीकरण का काम अडानी ग्रुप कर रहा है। कोर्ट ने बकाए बिलों का जिक्र करते हुए कहा कि हर ट्रीटमेंट प्लांट पर 60 से 65 लाख रुपये बकाया है। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि हलफनामे के आधार पर तो यही लग रहा है कि नगर निगम, जल संस्थान शुद्धिकरण के नाम पर केवल आंखों में धूल झाेंकने का काम कर रहा है। जबकि गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। कोर्ट ने सरकार की ओर से पैरवी कर रहे अपर महाधिवक्ता नीरज त्रिपाठी से ट्रीटमेंट प्लांट के बिलों का विवरण प्रस्तुत करने को भी कहा है।
हलफनामा दाखिल करें काशी विश्वनाथ कॉरिडार के सीईओ
सुनवाई के दौरान न्यायमित्र अधिवक्ता अरुण कुमार गुप्ता ने माघ मेले के दौरान कानपुर में टेनरियों को बंद करने की मांग की। साथ ही बताया कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण से निकला मलबा ललिता घाट पर दीवाल बनाकर डाल दिया गया है। इससे वहां पर गंगा का स्वाभाविक प्रवाह रुक गया है। इससे वहां का हेरिटेज एरिया खराब हो रहा है। जबकि, गंगा में मलबा बहाने का कोई कानून नहीं है।
कॉरिडोर बनाने के डीपीआर में भी मलबे को गंगा में डालने के बजाय दूसरे स्थान पर फेंकने की व्यवस्था की गई थी। मलबा गंगा में फेंकने से ललिता घाट और मणिकर्णिका घाट पर अतिक्रमण हो गया है। उन्होंने कहा कि माघ मेला नजदीक है। गंगा का पानी साफ न होने से संतों, महात्माओं और श्रद्धालुओं के लिए मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि, गंगा का पानी मौजूदा हालात में आचमन के योग्य नहीं है।
इस पर कोर्ट ने अपने पूर्व के आदेशों को देखते हुए 3700 क्यूसेक पानी रोजाना छोड़ने का आदेश दिया और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) से मामले में हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता शैलेष सिंह ने मोरी नाले से संगम में जा रहे गंदे पानी की जानकारी दी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान तीनों हलफनामों के आधार पर नगर निगम, जल संस्थान के कार्यों पर असंतोष जताया और सुनवाई के लिए 15 फरवरी की तिथि निर्धारित कर दी।