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High Court : विश्वसनीय और स्वैच्छिक मृत्युपूर्व बयान ही दोषसिद्धि का आधार हो सकता है
Sat, 18 Jul 2026 02:05 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 18 Jul 2026 02:05 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि मृत्युपूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) स्वैच्छिक, विश्वसनीय और संदेह से परे हो तो उसी के आधार पर ही किसी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि मृत्युपूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) स्वैच्छिक, विश्वसनीय और संदेह से परे हो तो उसी के आधार पर ही किसी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने छह माह की गर्भवती पत्नी को मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जलाने के मामले में दोषी पति उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
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यह आदेश न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ल की खंडपीठ ने सहारनपुर निवासी वसीम अहमद की आपराधिक अपील पर दिया। मामला सहारनपुर के देवबंद क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार नौ जनवरी 2012 को दहेज में 50 हजार रुपये की मांग को लेकर वसीम अहमद ने छह माह की गर्भवती पत्नी पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। गंभीर रूप से झुलसी महिला ने अस्पताल में मजिस्ट्रेट के समक्ष मृत्युपूर्व बयान दर्ज कराया। उपचार के दौरान 15 जनवरी 2012 को उसकी और गर्भ में पल रहे छह माह के भ्रूण की भी मौत हो गई।
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बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि घटना विवाह के सात साल से अधिक समय बाद हुई थी। इसलिए दहेज मृत्यु के प्रावधान लागू नहीं होते। मृत्युपूर्व बयान की विश्वसनीयता और गवाहों के बयान में देरी पर भी सवाल उठाए गए। वहीं, शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि दोषसिद्धि मुख्य रूप से मृत्युपूर्व बयान और चिकित्सकीय साक्ष्यों पर आधारित है।
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कोर्ट ने कहा कि मृतका 90 प्रतिशत तक झुलस चुकी थी। लेकिन चिकित्सक ने उसे बयान देने के लिए मानसिक रूप से सक्षम घोषित किया था। मेडिकल साक्ष्य, शरीर से मिट्टी के तेल की गंध और मृत्युपूर्व बयान एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं। ऐसे में मृत्युपूर्व बयान पूरी तरह भरोसेमंद है और उसी के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई सजा को बरकरार रखा।